शिव संहिता
परिचय
शिव संहिता हठयोग पर आधारित एक प्राचीन ग्रंथ है, जिसे भगवान शिव द्वारा पार्वती को उपदेश देने के रूप में प्रस्तुत किया गया है। यह ग्रंथ योग, तंत्र और अद्वैत वेदांत का अद्भुत समन्वय करता है।
- संभवतः रचना काल: 14वीं–17वीं शताब्दी
- भाषा: संस्कृत
- रूप: संवाद शैली (शिव और पार्वती के बीच)
- अध्याय: 5
- प्रमुख विषय: हठयोग, कुंडलिनी, प्राणायाम, मुद्रा, ध्यान, मोक्ष, तांत्रिक विचार आदि
📖 पाँच अध्यायों का संक्षिप्त सारांश:
🟠 1. प्रथम अध्याय – ब्रह्मज्ञान और योग का महत्व
- आत्मा और ब्रह्म का वर्णन
- योग का महत्त्व और योगी के लक्षण
- अद्वैत वेदांत के विचार – सब कुछ ब्रह्म है
- योगी को कैसा आचरण करना चाहिए
🟡 2. द्वितीय अध्याय – योगाभ्यास की आवश्यकता और योग के प्रकार
- योग के विभिन्न प्रकार: मंत्र योग, लय योग, हठ योग, राज योग
- गुरु की महिमा और योगी की पात्रता
- नाड़ी, प्राण, और बंधों की संक्षिप्त जानकारी
- ध्यान और तंत्र की भूमिका
🟢 3. तृतीय अध्याय – शरीर, नाड़ी और प्राणायाम
- 72,000 नाड़ियों का वर्णन
- चक्रों की स्थिति (मूलाधार, स्वाधिष्ठान आदि)
- प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान – पाँच वायु
- प्राणायाम की विधियाँ, लाभ और सावधानियाँ
- कुंभक, नाड़ी शुद्धि, भोजन नियम
🔵 4. चतुर्थ अध्याय – मुद्राएं और कुंडलिनी
- प्रमुख मुद्राएँ: महा मुद्रा, अश्विनी, वज्रोली आदि
- बंध: मूलबंध, जालंधर बंध, उदियान बंध
- कुंडलिनी जागरण की प्रक्रिया
- अमृत, सूर्य और चंद्र नाड़ियों का रहस्य
- मृत्यु पर विजय प्राप्त करने की योग विधियाँ
🟣 5. पंचम अध्याय – ध्यान, समाधि और मोक्ष
- ध्यान की विभिन्न विधियाँ
- ओंकार ध्यान
- समाधि के प्रकार – सविकल्प और निर्विकल्प
- ब्रह्मानुभूति और आत्मज्ञान
- जीवन्मुक्त योगी का वर्णन
🌟 शिव संहिता की विशेषताएं:
- हठयोग और तंत्र का समन्वय: यह ग्रंथ हठयोग के शारीरिक अभ्यास के साथ-साथ तांत्रिक साधना और ध्यान को जोड़ता है।
- ज्ञान और भक्ति का मेल: इसमें केवल योगिक प्रक्रियाएँ ही नहीं, बल्कि ब्रह्मज्ञान, भक्ति और गुरु-भक्ति पर भी ज़ोर दिया गया है।
- सर्वसमावेशकता: यह ग्रंथ गृहस्थों के लिए भी योग को उपयुक्त मानता है।
- कुंडलिनी जागरण: कुंडलिनी शक्ति का विस्तार से वर्णन करता है।
🔎 कुछ मुख्य श्लोक (उदाहरण):
"न जायते म्रियते वा कदाचित्,
नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।"
(आत्मा न कभी जन्म लेती है और न कभी मरती है)
"योगिनः परमं ज्ञानं,
ध्यानं च ज्ञानसंभवम्।"
(ध्यान से ज्ञान की प्राप्ति होती है, जो योगियों का परम उद्देश्य है।)
✅ उपयोगिता आज के समय में:
- शरीर और मन की शुद्धि के लिए
- तनाव, चिंता से मुक्ति
- कुंडलिनी साधना के लिए मार्गदर्शन
- तांत्रिक योग के गूढ़ रहस्यों को समझने के लिए
📘 श्लोकों का विवरण इस प्रकार है:
|
अध्याय संख्या |
अध्याय नाम (विषय) |
श्लोकों की संख्या |
|
1️⃣ |
ब्रह्मज्ञान
और योग का महत्व |
77 श्लोक |
|
2️⃣ |
योग के प्रकार और
अभ्यास की पात्रता |
85 श्लोक |
|
3️⃣ |
नाड़ी,
प्राणायाम और शारीरिक विज्ञान |
101 श्लोक |
|
4️⃣ |
मुद्राएं,
बंध और कुंडलिनी जागरण |
64 श्लोक |
|
5️⃣ |
ध्यान,
समाधि और मोक्ष की
स्थिति |
62 श्लोक |
🔢 कुल
श्लोक:
77 + 85 + 101 + 64 + 62 = 389 श्लोक
यदि आप चाहें तो
मैं अध्याय 1 के पूरा
श्लोक + सरल हिंदी अनुवाद भी क्रमवार देना
शुरू कर सकता हूँ।
क्या आप अध्याय 1 के
श्लोक 1 से शुरू करना
चाहेंगे?
🔱 शिव
संहिता – अध्याय 1
🧘 विषय:
ब्रह्मज्ञान, आत्मा, योग का
महत्व, और योगी के
लक्षण
✅ श्लोक
1
श्लोक (संस्कृत):
श्रीगणेशाय नमः । अथ
श्रीशिवसंहितायां प्रथमोध्यायः ।
भगवानुवाच ।
सिद्धोऽसि गणनाथ त्वं त्रैलोक्यस्येश्वरोऽसि
च ।
त्वत्तः प्रभृत्येतत्सर्वं मम रूपं निरामयम्
॥१॥
हिंदी अर्थ:
भगवान शिव कहते हैं
— हे गणेश! तुम सिद्ध
हो, तीनों लोकों के
स्वामी हो। यह समस्त
सृष्टि तुमसे ही प्रारंभ
होकर मेरे शुद्ध रूप
की अभिव्यक्ति है।
✅ श्लोक
2
श्लोक:
अहमेव जगत्सर्वं नान्यदस्ति कदाचन ।
मदन्यत्तु जगत्सर्वं मिथ्यैषा नात्र संशयः
॥२॥
हिंदी अर्थ:
यह सम्पूर्ण जगत
मैं ही हूँ, मेरे
सिवा कुछ भी नहीं
है। मेरे अतिरिक्त जो
कुछ प्रतीत हो रहा
है, वह मिथ्या (भ्रम)
है – इसमें कोई संदेह
नहीं।
✅ श्लोक
3
श्लोक:
एकोऽहं द्वितीयो नास्ति नान्यः
पश्यति कश्चन ।
ब्रह्माहं ब्रह्मवेदाहं नान्यदस्ति कदाचन ॥३॥
हिंदी अर्थ:
मैं ही एक मात्र
सत्य हूँ, दूसरा कोई
नहीं है। जो ब्रह्म
को जानता है,
वह वास्तव में
स्वयं ब्रह्मस्वरूप है – मेरे सिवा
कुछ भी अस्तित्व में
नहीं है।
✅ श्लोक
4
श्लोक:
मायया हि समाविष्टं विश्वं
पश्यन्ति योगिनः ।
मायया विवृतं ज्ञात्वा तत्त्वं
पश्यन्ति योगिनः ॥४॥
हिंदी अर्थ:
योगीजन इस जगत को
माया से आवृत (ढका)
हुआ देखते हैं। जब
माया का पर्दा हट
जाता है, तब ही
वे परम तत्त्व
(ब्रह्म) को पहचान पाते
हैं।
✅ श्लोक
5
श्लोक:
एको देवः केवलं निर्विकल्पः
सच्चिदानन्दः निर्विकारः निरञ्जनः ।
मायया सृष्ट्युपदेशक्रियार्थं शिवः शक्त्या युक्तः
प्रवर्तते ॥५॥
हिंदी अर्थ:
वह एक ही
देव (ब्रह्म) है – जो
निर्विकल्प, सच्चिदानंद स्वरूप, निर्विकार और
निरंजन (शुद्ध) है। वही
शिव, अपनी शक्ति के
माध्यम से सृष्टि, उपदेश
और अन्य क्रियाओं
में प्रकट होता है।
✅ श्लोक
6
श्लोक:
सृष्टिस्थितिलयकारि कार्यं तत्कुरुते प्रभुः
।
शिवः शक्त्या युक्तः सन्न
एक एव करोति
तत् ॥६॥
हिंदी अर्थ:
शिव ही शक्ति के
साथ मिलकर सृष्टि की
रचना, पालन और संहार
करते हैं। वे एक
ही प्रभु हैं
जो यह सब
कार्य करते हैं।
✅ श्लोक
7
श्लोक:
अनेकधा व्यवहृतं जगत्सर्वं च
पश्यतः ।
एवमेव सदा ज्ञेयं न
कार्यं किञ्चिदस्ति वै ॥७॥
हिंदी अर्थ:
जब कोई व्यक्ति
इस विविधता से
भरे जगत को सही
दृष्टि से देखता है,
तो वह जानता
है कि वास्तव
में कोई भी कार्य
स्वतंत्र रूप से नहीं
हो रहा – सब
कुछ उसी परम तत्त्व
का स्वरूप है।
✅ श्लोक
8
श्लोक:
ज्ञानमेव परं शक्त्या जगदेतच्चराचरम्
।
ज्ञानेनैव विनिर्मुक्तं ज्ञानेनैव प्रलीयते ॥८॥
हिंदी अर्थ:
यह सम्पूर्ण चराचर
जगत ज्ञान की परम
शक्ति से उत्पन्न हुआ
है, उसी ज्ञान से
बंधन टूटता है और
उसी ज्ञान से मुक्ति
(लय) भी होती है।
✅ श्लोक
9
श्लोक:
यदा ज्ञानेन ज्ञातव्यं तत्त्वं
साक्षात्कृतं भवेत् ।
तदा विनिर्मलं ज्ञानं मोक्षरूपं प्रजायते
॥९॥
हिंदी अर्थ:
जब कोई व्यक्ति
सच्चे ज्ञान के द्वारा
उस तत्त्व (ब्रह्म)
का साक्षात अनुभव
कर लेता है,
तब उसका ज्ञान
पूर्णतः शुद्ध हो जाता
है और वही
ज्ञान उसे मोक्ष प्रदान
करता है।
✅ श्लोक
10
श्लोक:
आत्मा च सच्चिदानन्दो
नित्यः परिपूर्णः स्वयम् ।
अव्ययः सर्वगतश्चैव सदा मुक्तः सनातनः
॥१०॥
हिंदी अर्थ:
आत्मा सच्चिदानंद (सत्-चित्-आनंद)
स्वरूप है, नित्य है,
स्वयं पूर्ण है, अविनाशी
है, सर्वव्यापी है, सदा मुक्त
है और सनातन
(शाश्वत) है।
✅ श्लोक
11
श्लोक:
असङ्गो निष्क्रियो नित्यः शुद्धबुद्धिस्वरूपकः ।
सर्वत्र समवेतश्च ज्ञेयो जीवः
सनातनः ॥११॥
हिंदी अर्थ:
जीवात्मा वास्तव में आसक्ति
रहित, क्रियाओं से परे,
नित्य, शुद्ध-बुद्धिस्वरूप और
सर्वत्र व्याप्त है – उसे
ही सनातन जीव
कहा गया है।
✅ श्लोक
12
श्लोक:
संसारस्य महादुःखात् तारणं ज्ञानमुच्यते ।
ज्ञानं सद्गुरुमार्गेण लभ्यते नान्यथा क्वचित्
॥१२॥
हिंदी अर्थ:
इस संसार के
महान दुःख से उद्धार
पाने का साधन ज्ञान
है। यह ज्ञान केवल
सद्गुरु के मार्गदर्शन से
ही प्राप्त होता
है, अन्यथा नहीं।
✅ श्लोक
13
श्लोक:
नैव तत्त्वं गुरुं विना
ज्ञायते तत्त्वकोविदैः ।
ज्ञानं मुक्त्यैकसाधनं तस्मात् तं पूजयेद्गुरुम्
॥१३॥
हिंदी अर्थ:
गुरु के बिना, भले
ही कोई विद्वान
क्यों न हो,
तत्त्व का ज्ञान नहीं
पा सकता। चूंकि
ज्ञान ही मुक्ति का
एकमात्र साधन है, इसलिए
गुरु की पूजा करनी
चाहिए।
✅ श्लोक
14
श्लोक:
सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञः सर्वतन्त्रविशारदः ।
यो गुरुः स
शिवः साक्षाद्भाव्यः श्रद्धासमन्वितैः ॥१४॥
हिंदी अर्थ:
जो गुरु शास्त्रों
के अर्थ, तत्त्वों
और तंत्रों में
पारंगत है – वही साक्षात
शिवस्वरूप माना जाता है।
शिष्य को ऐसे गुरु
में पूर्ण श्रद्धा रखनी
चाहिए।
✅ श्लोक
15
श्लोक:
गुरुमेवानुसन्धानं कुर्यान्नान्यं कदाचन ।
संसारदुःखत्राणं ज्ञानं गुरुकृपात्सदा ॥१५॥
हिंदी अर्थ:
सच्चे साधक को केवल
गुरु की खोज में
ही लगे रहना
चाहिए – अन्य कुछ नहीं।
संसार के दुःखों से
मुक्ति दिलाने वाला ज्ञान
सदा गुरु की कृपा
से ही प्राप्त
होता है।
✅ श्लोक
16
श्लोक:
शिष्यः शुद्धोऽभिविनीतो गुरुसेवापरायणः ।
गुरुं प्राप्य यथान्यायं तत्त्वं
ज्ञातुं स योग्यताम्
॥१६॥
हिंदी अर्थ:
जो शिष्य शुद्ध,
विनीत और गुरुसेवा में
तत्पर होता है, वही
योग्य होता है गुरु
से तत्त्वज्ञान प्राप्त
करने के लिए।
✅ श्लोक
17
श्लोक:
गुरोः कृपाप्रसादेन तत्त्वं साक्षात्प्रवर्तते ।
अतो गुरौ प्रतिष्ठाप्यं तत्त्ववेत्त्रैः
विशेषतः ॥१७॥
हिंदी अर्थ:
गुरु की कृपा से
ही सच्चे तत्त्व
का साक्षात्कार होता
है। इसलिए विशेष रूप
से तत्त्व को
जानने वालों को गुरु
में स्थिर श्रद्धा रखनी
चाहिए।
✅ श्लोक
18
श्लोक:
न मुक्त्युपायो बहुधा
न योगो न
च कर्मकृत् ।
गुरुभक्तिरसं तस्मादेकमेव समाश्रयेत् ॥१८॥
हिंदी अर्थ:
मुक्ति के बहुत से
उपाय नहीं हैं – न
तो केवल योग,
न ही कर्म।
केवल एक ही उपाय
श्रेष्ठ है – गुरुभक्ति। इसलिए
उसी का आश्रय लेना
चाहिए।
✅ श्लोक
19
श्लोक:
विहाय ज्ञानहीनं तु शास्त्रं च
विविधं बहु ।
गुरुवाक्यं समाश्रित्य तत्त्वं साक्षाद्विनिर्णयेत् ॥१९॥
हिंदी अर्थ:
ज्ञानहीन और केवल वाद-विवाद में उलझे
शास्त्रों को त्यागकर, शिष्य
को गुरु के
वचनों का आश्रय लेकर
तत्त्व का साक्षात् निर्णय
करना चाहिए।
✅ श्लोक
20
श्लोक:
गुरुवाक्यं परं ब्रह्म न
किञ्चित् परिशङ्कते ।
यः शिष्यस्तत्त्वनिश्चित्त्वात् स निःशङ्को
हि सद्गुरुः ॥२०॥
हिंदी अर्थ:
जो शिष्य गुरु
के वचनों को
ही परम ब्रह्म
मानता है, वह संदेह
रहित होकर तत्त्वज्ञान को
प्राप्त करता है। ऐसा
शिष्य ही सच्चे गुरु
के योग्य होता
है।
✅ श्लोक
21
श्लोक:
गुरोः प्रसादात् सर्वं सिध्यति नात्र
संशयः ।
तस्मात्सम्पूज्य सर्वात्मा गुरुं भक्त्या समन्वितः
॥२१॥
हिंदी अर्थ:
गुरु की कृपा से
ही सब कुछ
सिद्ध होता है – इसमें
कोई संदेह नहीं। इसलिए
गुरु, जो समस्त आत्माओं
में स्थित हैं, की
भक्ति और श्रद्धा से
पूजा करनी चाहिए।
✅ श्लोक
22
श्लोक:
यथाशक्ति गुरुं नित्यं सेवेत
श्रद्धयान्वितः ।
प्रसन्नो यः गुरुः शिष्ये
तस्मै ज्ञानं प्रदर्शयेत् ॥२२॥
हिंदी अर्थ:
शिष्य को चाहिए कि
वह अपनी शक्ति
के अनुसार प्रतिदिन
श्रद्धापूर्वक गुरु की सेवा
करे। जब गुरु प्रसन्न
होता है, तभी वह
शिष्य को ज्ञान प्रदान
करता है।
✅ श्लोक
23
श्लोक:
गुरोः प्रसादाद्विन्दन्ति शान्तिं परमसुखप्रदाम् ।
तेषां नाश्यन्ति पापानि सन्ति विद्याविवर्जिताः
॥२३॥
हिंदी अर्थ:
गुरु की कृपा से
साधक परम सुखदायक शांति
प्राप्त करते हैं। ऐसे
लोगों के सारे पाप
नष्ट हो जाते हैं,
भले ही उन्हें पारंपरिक
विद्या न प्राप्त
हो।
✅ श्लोक
24
श्लोक:
गुरोरनुग्रहात्सिद्धिः पुण्यं प्राप्नोति मानवः
।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन गुरोः कृपामवाप्नुयात् ॥२४॥
हिंदी अर्थ:
गुरु की अनुग्रह से
ही योग की
सिद्धि और पुण्य की
प्राप्ति होती है। इसलिए
साधक को पूरी लगन
से गुरु की
कृपा पाने का प्रयास
करना चाहिए।
✅ श्लोक
25
श्लोक:
यस्य कृपानुयुगेन मोहमायाविनाशिनी ।
कृपा स्यात् स गुरुः
साक्षान्नान्यः स्याज्जगतीतले ॥२५॥
हिंदी अर्थ:
जिस गुरु की कृपा
से मोह और
माया का नाश हो
जाता है, वही सच्चा
गुरु है। उसके समान
कोई अन्य गुरु संसार
में नहीं हो सकता
✅ श्लोक
26
श्लोक:
शिष्यः संशयसङ्घातं त्यक्त्वा सर्वं समाहितः ।
गुरुवाक्यं समाश्रित्य तत्त्वं ज्ञातुं समर्हति
॥२६॥
हिंदी अर्थ:
जो शिष्य संदेहों
को त्यागकर मन
से स्थिर हो
जाए और गुरु के
वचनों का आश्रय ले,
वही तत्त्व (परम सत्य)
को जानने के
योग्य होता है।
✅ श्लोक
27
श्लोक:
गुरुवाक्यं हि सच्चैव सत्यमेव
न संशयः ।
गुरोराज्ञां यः किल त्यक्त्वा
विद्यां अन्यां समाचरेत् ॥२७॥
हिंदी अर्थ:
गुरु का वचन ही
सच्चा और सत्य है
– इसमें कोई संदेह नहीं।
जो व्यक्ति गुरु
की आज्ञा को
छोड़कर अन्य ज्ञान की
खोज करता है…
✅ श्लोक
28
श्लोक:
स पापिष्ठतमो मूढो
नरकं प्रतिपद्यते ।
न च तस्य
भवेद्विद्धि ज्ञानं सत्यं हि
मे वचः ॥२८॥
हिंदी अर्थ:
…वह व्यक्ति अति पापी,
मूर्ख और नरक को
प्राप्त होता है। उसे
कभी भी सच्चा ज्ञान
नहीं मिलता – यह मेरा
सत्य वचन है।
✅ श्लोक
29
श्लोक:
गुरुभक्तिसमं तत्त्वं न किंचिदिह
विद्यते ।
गुरुभक्तिर्यथा तत्त्वं तथा सत्यं
च नान्यथा ॥२९॥
हिंदी अर्थ:
इस संसार में
गुरु भक्ति के समान
कोई दूसरा तत्त्व नहीं
है। जैसे गुरु भक्ति
तत्त्व है, वैसे ही
वह सत्य भी
है – अन्य कुछ नहीं।
✅ श्लोक
30
श्लोक:
शिवेन शश्वदात्मैव गुरुरित्यभिधीयते ।
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन गुरुं रक्षेत् प्रयत्नतः
॥३०॥
हिंदी अर्थ:
शिव सदा स्वयं आत्मा
के रूप में
गुरु कहलाते हैं। इसलिए
हर साधक को
पूरे प्रयत्न से अपने
गुरु की रक्षा (आदर
व सेवा) करनी
चाहिए।
✅ श्लोक
31
श्लोक:
गुरुं त्यक्त्वा न कोऽप्यत्र
परं तत्त्वं समाश्रयेत् ।
गुरोर्यः स्यान्न सन्देहं स
वन्द्यो यतिसत्तमः ॥३१॥
हिंदी अर्थ:
गुरु को त्यागकर कोई
भी साधक परम
तत्त्व को प्राप्त नहीं
कर सकता। जो
गुरु को अपना सब
कुछ मानता है, वही
सच्चे अर्थों में पूज्य
महान योगी है।
✅ श्लोक
32
श्लोक:
गुरुदेवो महेशश्च गुरुदेवो जनार्दनः
।
गुरुदेवः परं ब्रह्म तस्मात्सम्पूज्य
एव सः ॥३२॥
हिंदी अर्थ:
गुरु ही महादेव हैं,
गुरु ही विष्णु हैं,
गुरु ही परम ब्रह्म
हैं – इसलिए गुरु की
पूजा करना अनिवार्य है।
✅ श्लोक
33
श्लोक:
न गुरोरधिकं तत्त्वं
न गुरोरधिकं तपः
।
तत्त्वज्ञानात्परं नास्ति तस्मात् तत्त्वं
समाश्रयेत् ॥३३॥
हिंदी अर्थ:
गुरु से श्रेष्ठ कोई
तत्त्व नहीं, गुरु से
श्रेष्ठ कोई तप नहीं।
तत्त्वज्ञान से ऊपर कुछ
नहीं – इसलिए उसी तत्त्व
(गुरुज्ञान) का आश्रय लेना
चाहिए।
✅ श्लोक
34
श्लोक:
अनेकजन्मसंसिद्धं ब्रह्मज्ञानं लभ्यते ध्रुवम् ।
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन तत्त्वं ज्ञेयं मुमुक्षुभिः
॥३४॥
हिंदी अर्थ:
कई जन्मों की
तपस्या और साधना के
बाद ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति होती
है – इसलिए जो मोक्ष
की इच्छा रखते
हैं, उन्हें पूरे प्रयास
से तत्त्व को
जानना चाहिए।
✅ श्लोक
35
श्लोक:
कुर्वन् धर्मान्यनेकानि योगाभ्यासविवर्जितः ।
न लभेत परं
तत्त्वं जन्मकोटिशतैरपि ॥३५॥
हिंदी अर्थ:
जो व्यक्ति अनेक
धार्मिक कर्म करता है
लेकिन योग का अभ्यास
नहीं करता, वह करोड़ों
जन्मों में भी परम
तत्त्व को प्राप्त नहीं
कर सकता।
✅ श्लोक
36
श्लोक:
योगमेव सदा कुर्वन्स तत्त्वं
लभते ध्रुवम् ।
न तु कर्मसहस्राणि
योगाभ्यासविवर्जितः ॥३६॥
हिंदी अर्थ:
जो व्यक्ति निरंतर
योग का अभ्यास करता
है, वही निश्चित रूप
से परम तत्त्व
को प्राप्त करता
है। केवल हज़ारों कर्म
करने से योग के
बिना वह संभव नहीं।
✅ श्लोक
37
श्लोक:
न शास्त्रं न
तपो दानं न तीर्थं
न च वाहनम्
।
न यज्ञा योगिनां
तत्त्वं लभ्यते योगतः पृथक्
॥३७॥
हिंदी अर्थ:
ना तो शास्त्र,
तप, दान, तीर्थयात्रा, ना
ही वाहनों या
यज्ञों से योग के
बिना तत्त्व की प्राप्ति
होती है।
✅ श्लोक
38
श्लोक:
न योगो न
च मुक्तिः स्यात्तत्त्वं
यत्र न विद्यते
।
तस्मात्तत्त्वं प्रबोध्यं सदा साधकवृन्दकैः ॥३८॥
हिंदी अर्थ:
जहाँ तत्त्वज्ञान नहीं है, वहाँ
न योग है
और न ही
मुक्ति। इसलिए साधकों को
सदा तत्त्व को ही
जाग्रत और जानने का
प्रयास करना चाहिए।
✅ श्लोक
39
श्लोक:
योगी तत्त्वविनिर्णेयी योगमेव सदा भजेत्
।
योगेन रहितं तत्त्वं न
ज्ञेयं शतजन्मसु ॥३९॥
हिंदी अर्थ:
सच्चा योगी वही है
जो तत्त्व का
निर्णय कर सकता है
और सदा योग
में रत रहता है।
योग के बिना तत्त्वज्ञान
सैकड़ों जन्मों में भी
संभव नहीं।
✅ श्लोक
40
श्लोक:
एवमुक्त्वा महादेवो पार्वत्यै परिपूजितः
।
प्रणिपत्य स्वया तुष्ट्या तत्त्वं
कथयते पुनः ॥४०॥
हिंदी अर्थ:
इस प्रकार भगवान
महादेव ने जब यह
ज्ञान पार्वती को बताया,
तब उन्होंने महादेव
की पूजा कर
विनम्रतापूर्वक प्रणाम किया। फिर
महादेव संतुष्ट होकर आगे
तत्त्वज्ञान बताते हैं।
✅ श्लोक
41
श्लोक:
न चापि तत्त्वं
बहुधा विवेच्यं
न चापि योगः
क्रियते बहूनि ।
एकस्य वक्तुः कथनात्सुधीभिः
संपूज्यते तद्भवति प्रबुद्धम् ॥४१॥
हिंदी अर्थ:
तत्त्व को बहुत
ज़्यादा विश्लेषण करने
की आवश्यकता नहीं
होती, न ही योग को
बहुत सारे तरीकों
से करना जरूरी
है। यदि एक ज्ञानी पुरुष
ठीक तरह से समझा दे,
तो बुद्धिमान साधक
उसे अपनाकर जागरूक
हो जाते हैं।
________________________________________
✅ श्लोक
42
श्लोक:
सर्वत्र तत्त्वं सुलभं नरेषु
गुह्यं न वेद्यं
न वचः प्रसक्तम्
।
स्वयं विमृश्येह सतां वरिष्ठं
गुह्यं तु तत्त्वं
हृदि निश्चितव्यम् ॥४२॥
हिंदी अर्थ:
यह तत्त्वज्ञान सभी स्थानों
पर उपलब्ध तो
है, परंतु यह
अत्यंत रहस्यमय भी
है। अतः इसे हर किसी
को सहजता से
नहीं बताया जाना
चाहिए। इसे बुद्धिमत्तापूर्वक
समझकर अपने अंतःकरण
में स्थिर करना
चाहिए।
________________________________________
✅ श्लोक
43
श्लोक:
तत्त्वं न योगेन
न सांख्येन कर्मणा
न विद्यया तत्त्वत एव
भाष्यते ।
प्रसादितेन गुरुणा तु
लभ्यते
येनात्मतत्त्वं
बहुधा प्रकाशते ॥४३॥
हिंदी अर्थ:
तत्त्व न तो
केवल योग से, न सांख्य
दर्शन से, न कर्मों से
और न ही केवल विद्या
से समझा जा सकता है।
जब गुरु प्रसन्न
होते हैं, तभी
वह आत्मतत्त्व को
प्रकाशित करते हैं।
________________________________________
✅ श्लोक
44
श्लोक:
शमः क्षमा दया
शौचं सत्यं धर्मो
हि यत्परम् ।
एतानि तत्त्वबोधस्य साधनानि दिने
दिने ॥४४॥
हिंदी अर्थ:
मन की शांति,
क्षमा, दया, पवित्रता,
सत्य और धर्म
– ये सब तत्त्वबोध
के लिए आवश्यक
साधन हैं और इनका प्रतिदिन
अभ्यास करना चाहिए।
________________________________________
✅ श्लोक
45
श्लोक:
यथा दीपो हि
तैलस्थो वायुनाऽपि न
चालयेत् ।
तथा चित्तं समाहितं
न स्याद्विषयगामिनम् ॥४५॥
हिंदी अर्थ:
जिस प्रकार तेल
से भरा दीपक
हवा से भी नहीं डगमगाता,
उसी प्रकार जब
चित्त स्थिर होता
है, तो वह विषयों की
ओर नहीं जाता।
________________________________________
✅ श्लोक
46
श्लोक:
विषयेभ्यः परं चित्तं
नित्यं तत्त्वमयान्वितम् ।
संयुक्तं यः करोतीह
स योगी भवति
ध्रुवम् ॥४६॥
हिंदी अर्थ:
जो व्यक्ति अपने चित्त
को सदा विषयों
से परे तत्त्व
में लगाए रखता
है, वही निश्चय
ही सच्चा योगी
होता है।
________________________________________
✅ श्लोक
47
श्लोक:
न देहं न
मनो बुद्धिं न
चित्तं न च वासनाम् ।
न विज्ञानं न चाहङ्कारं
ज्ञेयं चैकं परं
पदम् ॥४७॥
हिंदी अर्थ:
न तो शरीर,
न मन, न बुद्धि, न चित्त,
न वासना, न
विज्ञान और न ही अहंकार
– इनको जानने योग्य
नहीं माना गया
है; केवल एक ही परमतत्त्व
जानने योग्य है।
________________________________________
✅ श्लोक
48
श्लोक:
एकं निर्विकल्पं नित्यमेकमेव निरामयम्
।
नित्यशुद्धं शिवं शान्तं
तत्त्वं वेद विदो
विदुः ॥४८॥
हिंदी अर्थ:
वेद के ज्ञानी
लोग उस एकमात्र
तत्त्व को जानते
हैं जो निरविकारी,
नित्य, निरोगी, सदा
शुद्ध, शिवस्वरूप और
शांत है।
________________________________________
✅ श्लोक
49
श्लोक:
शिवोऽहं शिवोऽहं शिवोऽहं केवलोऽहम्
।
निर्मलं निराकारं नित्यं मुक्तस्वरूपकम्
॥४९॥
हिंदी अर्थ:
मैं शिव हूँ,
मैं ही शिव हूँ, मैं
केवल शिव हूँ।
मैं निर्मल, निराकार,
नित्य और मुक्तस्वरूप
हूँ।
________________________________________
✅ श्लोक
50
श्लोक:
न मे जन्म
न मे मृत्युर्न
मे बन्धनं सदा
।
न मे जाति
न मे कर्म न मे
पापं न पुण्यकम्
॥५०॥
हिंदी अर्थ:
मुझे न जन्म
है, न मृत्यु;
न कोई बंधन
है; न कोई जाति है,
न कोई कर्म;
न पाप है और न
पुण्य – मैं इन सबसे परे
हूँ।
________________________________________
✅ श्लोक
51
श्लोक:
न मे द्वैतं
न मे तत्त्वं
न मे संयोगकर्मणि
।
न मे दुःखं
न मे हर्षो
न मे जन्म पुनर्भवः ॥५१॥
हिंदी अर्थ:
मुझे न द्वैत
है, न कोई विशेष तत्त्व;
न संयोग के
कर्म हैं; न कोई दुःख
है, न कोई हर्ष, और
न पुनर्जन्म है।
________________________________________
✅ श्लोक
52
श्लोक:
एकोऽहमस्मि सततं मे
रूपं च केवलं शिवः ।
अव्यक्तं च निराकारं
निर्गुणं निर्विकल्पकम् ॥५२॥
हिंदी अर्थ:
मैं सदा एक
ही हूँ, और मेरा स्वरूप
केवल शिव है –
अव्यक्त, निराकार, निर्गुण और
निर्विकल्प।
________________________________________
✅ श्लोक
53
श्लोक:
सर्वं माया समाच्छन्नं
सर्वं मोहात्मकं जगत्
।
स्वप्नवत्सर्वमेतत्तु
सत्यमेवान्यथाऽखिलम् ॥५३॥
हिंदी अर्थ:
पूरा जगत माया
से ढका हुआ है और
मोह से बना है। यह
सब स्वप्न के
समान है। वास्तविक
सत्य कुछ और ही है।
________________________________________
✅ श्लोक
54
श्लोक:
ज्ञानेन मुक्तिरित्युक्तं केवलं नान्यथैव
तु ।
ज्ञानं च सत्यं
ज्ञानं हि मुक्तिसाधनमुत्तमम्
॥५४॥
हिंदी अर्थ:
मुक्ति केवल ज्ञान
से ही प्राप्त
होती है, किसी
अन्य साधन से नहीं। ज्ञान
ही सत्य है और वही
मुक्ति प्राप्त करने
का सर्वोत्तम साधन
है।
________________________________________
✅ श्लोक
55
श्लोक:
ज्ञानं च ध्यानसंयुक्तं
ध्यानं ज्ञानसमान्वितम् ।
ज्ञानं ध्यानं च
यो वेत्ति स
ज्ञानी मुक्तिमश्नुते ॥५५॥
हिंदी अर्थ:
ज्ञान और ध्यान
दोनों एक-दूसरे
से जुड़े हैं।
जो व्यक्ति इन
दोनों को एकसाथ
समझता है, वही सच्चा ज्ञानी
है और वही मुक्ति को
प्राप्त करता है।
________________________________________
✅ श्लोक
56
श्लोक:
ज्ञानिनो न हि
संसारं विशन्ति पुनरेव
हि ।
तेषां कर्माण्यशेषाणि नश्यन्ति ज्ञानतेजसा ॥५६॥
हिंदी अर्थ:
सच्चे ज्ञानी जन
फिर कभी संसार
में नहीं लौटते।
उनके सभी कर्म
ज्ञान के तेज से भस्म
हो जाते हैं।
________________________________________
✅ श्लोक
57
श्लोक:
ज्ञानं च सर्वदृश्येषु
विशेषेण प्रकाशते ।
वह्निवज्ज्वलितं
तद्वत्सर्वं दग्धं भविष्यति
॥५७॥
हिंदी अर्थ:
सच्चा ज्ञान प्रत्येक
वस्तु में अपनी
विशिष्ट उपस्थिति दर्शाता
है। जैसे अग्नि
संपर्क में आई वस्तु को
भस्म कर देती है, वैसे
ही आत्मज्ञान भी
अज्ञान और बंधनों
को समाप्त कर
देता है।
________________________________________
✅ श्लोक
58
श्लोक:
नानारूपमिदं सर्वं मिथ्याज्ञानसमन्वितम्
।
विज्ञाते तत्त्वतो युक्तं ज्ञानं
च स्याद्विचक्षणम् ॥५८॥
हिंदी अर्थ:
यह समस्त जगत
अनेक रूपों में
मिथ्या ज्ञान से
भरा हुआ है। जब कोई
व्यक्ति तत्त्व को
सही रूप में जानता है,
तभी वह विवेकशील
ज्ञान को प्राप्त
करता है।
________________________________________
✅ श्लोक
59
श्लोक:
एकं ज्ञानं द्वितीयं
न स्याद्दृष्टं वेदवेदिनाम्
।
यतो हि ब्रह्मणो
रूपं ब्रह्म तेनैव
लक्ष्यते ॥५९॥
हिंदी अर्थ:
ज्ञान एक ही
है, दूसरा कोई
नहीं है – यह वेद और
वेदज्ञों द्वारा कहा
गया है। ब्रह्म
का रूप भी वही है
और उसी से ब्रह्म की
प्राप्ति होती है।
________________________________________
✅ श्लोक
60
श्लोक:
ज्ञानं चैकं शिवं
शान्तं मुक्त्यैक्यं ब्रह्मनिष्ठितम्
।
सर्वोपाधिविनिर्मुक्तं
ज्ञानं स्याद्वैराग्यवत् ॥६०॥
हिंदी अर्थ:
ज्ञान एक ही
है – शिवस्वरूप, शांत,
मुक्ति से युक्त
और ब्रह्म में
स्थित। जब यह ज्ञान सभी
उपाधियों (बाह्य पहचानों)
से मुक्त होता
है, तभी वह सच्चा ज्ञान
है।
✅ श्लोक 61
श्लोक:
ज्ञेयं तु परमं तत्त्वं ब्रह्मरूपं निरूपकम् ।
निर्गुणं सर्वरूपं च सर्वसंवित्प्रकाशकम् ॥६१॥
हिंदी अर्थ:
जिसे जानना चाहिए वह परम तत्त्व है, जो ब्रह्मस्वरूप है, जिसे पूरी तरह परिभाषित नहीं किया जा सकता। वह निर्गुण होते हुए भी सर्वरूप है और समस्त चेतना का प्रकाशक है।
✅ श्लोक 62
श्लोक:
सर्वस्य चोदयकर्ता च साक्षिरूपो महेश्वरः ।
सर्वदृष्टिगम्यं च तत्सर्वस्य च हृदि स्थितम् ॥६२॥
हिंदी अर्थ:
महेश्वर ही सबके कर्मों को प्रेरित करने वाले साक्षी हैं। वे सबकी दृष्टि में आने योग्य हैं और सबके हृदय में स्थित रहते हैं।
✅ श्लोक 63
श्लोक:
ज्ञातव्यं परमं तत्त्वं सर्वव्यापि निरञ्जनम् ।
निर्मलं ज्ञानरूपं च ब्रह्मरूपं निरामयम् ॥६३॥
हिंदी अर्थ:
जिस परम तत्त्व को जानना है, वह सर्वव्यापक, निष्कलंक, निर्मल ज्ञानस्वरूप, ब्रह्मस्वरूप और रोगरहित (निर्दोष) है।
✅ श्लोक 64
श्लोक:
शिवेन कथितं तत्त्वं ज्ञानरूपं सनातनम् ।
गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयमेव स्ववृत्तितः ॥६४॥
हिंदी अर्थ:
यह जो ज्ञानरूप सनातन तत्त्व शिव द्वारा बताया गया है, उसे प्रयत्नपूर्वक गुप्त रखना चाहिए और स्वयं के आचरण से ही इसका अभ्यास करना चाहिए।
✅ श्लोक 65
श्लोक:
शिववाक्यं परं नास्ति योगिनां हितकाम्यया ।
गोपनीयं प्रयत्नेन न कदाचिद्विलिख्यते ॥६५॥
हिंदी अर्थ:
योगियों के हित के लिए शिव का उपदेश ही परम है। इसे गुप्त रखा जाना चाहिए और कभी भी इसे साधारणतः लिखित रूप में नहीं दिया जाना चाहिए।
✅ श्लोक 66
श्लोक:
विद्यार्थिनां गुणज्ञस्य भक्तियुक्तस्य योगिनः ।
दातव्यं तत्त्वविज्ञाने तस्मै देयं प्रयत्नतः ॥६६॥
हिंदी अर्थ:
जो साधक गुणों की समझ रखता है,
श्रद्धा से युक्त है और नियमित रूप से योग का अभ्यास करता है — केवल उसी योग्य व्यक्ति
को यह गूढ़ तत्त्वज्ञान प्रदान किया जाना चाहिए।
✅ श्लोक 67
श्लोक:
यस्य ज्ञानं च युक्तं च संयमश्चैव वर्तते ।
नित्यं शिवमयी चित्तं तस्मै देयं प्रयत्नतः ॥६७॥
हिंदी अर्थ:
जिसका ज्ञान और अभ्यास संयम से युक्त हो, जिसका चित्त सदैव शिव में लीन रहता हो – ऐसे साधक को यह ज्ञान दिया जाना चाहिए।
✅ श्लोक 68
श्लोक:
दातव्यं च न संशयस्तत्त्वज्ञानं महात्मने ।
लुब्धायातपसः शिष्याय न देयं परमार्थवत् ॥६८॥
हिंदी अर्थ:
इस तत्त्वज्ञान को महान आत्मा को ही देना चाहिए – इसमें संदेह नहीं है। परंतु लालची और बिना तपस्या किए हुए शिष्य को यह ज्ञान कभी नहीं देना चाहिए।
✅ श्लोक 69
श्लोक:
गोपनीयं प्रयत्नेन विद्येयं योगिनां सदा ।
योगयुक्ताय चोक्तं वै सदा सिद्धिप्रदं मतम् ॥६९॥
हिंदी अर्थ:
इस योगविद्या को हमेशा प्रयत्नपूर्वक गुप्त रखना चाहिए। केवल योग में युक्त साधक को ही इसे बताया जाए, क्योंकि यह सिद्धि प्रदान करती है।
✅ श्लोक 70
श्लोक:
शिववाक्यं महागूढं योगिनां मुक्तिदायकम् ।
योगविद्यां शिवोक्तां च यः पठेत्स श्रद्धायुतः ॥७०॥
हिंदी अर्थ:
शिव का यह उपदेश अत्यंत गूढ़ है और योगियों को मुक्ति देने वाला है। जो श्रद्धा से इस योगविद्या को पढ़ता है –
✅ श्लोक 71
श्लोक:
न स पापं न दुःखं च न क्लेशं न च व्यथाम् ।
न दुःस्वप्नं न च भयं न तस्यास्ति कदाचन ॥७१॥
हिंदी अर्थ:
उस व्यक्ति को पाप नहीं सताता, न ही दुःख, क्लेश, चिंता, बुरे स्वप्न या भय उसे होता है।
✅ श्लोक 72
श्लोक:
वेदशास्त्रार्थतत्त्वज्ञो योगविद्याविशारदः ।
सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञो योगयुक्तो भवेन्नरः ॥७२॥
हिंदी अर्थ:
जो वेद और शास्त्रों के तत्त्व को जानता है और योगविद्या में निपुण है, वह पुरुष सभी शास्त्रों के अर्थ को जानने वाला और योगयुक्त बनता है।
✅ श्लोक 73
श्लोक:
कायस्थो यः पठेन्नित्यं तत्त्वार्थं योगवित्तमम् ।
स याति परमं स्थानं शिवेन सह मोदते ॥७३॥
हिंदी अर्थ:
जो व्यक्ति प्रतिदिन इस योगतत्त्व ज्ञान को पढ़ता है, वह परम स्थान को प्राप्त करता है और शिव के साथ आनन्द में लीन होता है।
✅ श्लोक 74
श्लोक:
ध्यानं श्रवणं यश्च कुर्याद्भक्त्या समाहितः ।
स याति परमं स्थानं शिवधामे च गच्छति ॥७४॥
हिंदी अर्थ:
जो भक्तिपूर्वक मन को एकाग्र करके इसका ध्यान और श्रवण करता है, वह भी शिव के धाम को प्राप्त करता है।
✅ श्लोक 75
श्लोक:
शिववाक्यं पठेद्यस्तु योगविद्याविशारदः ।
शिवधाम्नि च रमते मोदते च शिवं विना ॥७५॥
हिंदी अर्थ:
जो शिव के वचनों का पाठ करता है और योगविद्या में निपुण होता है, वह शिवधाम में आनंदपूर्वक रमण करता है।
✅ श्लोक 76
श्लोक:
योगविद्यां महागूढां शिववाक्येन भाषिताम् ।
श्रद्धया यः पठेन्नित्यं स याति परमं पदम् ॥७६॥
हिंदी अर्थ:
जो व्यक्ति इस महा-गूढ़ योगविद्या को, जो शिव के वचनों में वर्णित है, श्रद्धा से प्रतिदिन पढ़ता है, वह परम पद को प्राप्त करता है।
✅ श्लोक 77 (अंतिम श्लोक)
श्लोक:
सर्वदुःखविनिर्मुक्तो योगयुक्तः सदा भवेत् ।
सर्वसंपत्तिसंयुक्तः सदा भूयो न जायते ॥७७॥
हिंदी अर्थ:
जो साधक योग में स्थित रहता
है, वह सभी दुःखों से मुक्त हो जाता है। वह पूर्ण सुख और शांति को प्राप्त कर लेता
है, और फिर जन्म-मरण के चक्र में नहीं पड़ता।
शिव
संहिता – अध्याय 2 का सार
1. ब्रह्माण्ड का सूक्ष्म रूप
यह अध्याय बताता है कि हमारे शरीर में बाह्य जगत का सूक्ष्म प्रतिबिंब होता है। जैसे उत्तराखंड की पर्वत श्रेणी—‘मेरु’ रूपी रीढ़ (स्पाइनल कॉलम), नदियाँ, ग्रह-तारे, वायु, अग्नि, आकाश आदि—सब हमारे अंदर विद्यमान हैं नाड़ी जाल का वर्णन
पूरे शरीर में ३५०,००० से अधिक नाड़ियाँ होती हैं, जिनमें से १४ प्रमुख हैं। इनमें इडा, पिंगला और
सुषुम्णा नाड़ियों
को
विशेष
रूप
से
महत्त्व
दिया
गया
है,
क्योंकि
इनके
माध्यम
से
जीवन
ऊर्जा
संचालित
होती
है
2. आन्तरिक–बाह्य समता का ज्ञान
अध्याय
में
बताया
गया
है
कि
जैसे
बाहरी
ब्रह्मांड
में
सब
कुछ
देखा
जाता
है,
वैसे
ही
यह
सब
हमारे
शरीर
में
मौजूद
है।
यही
ज्ञान
योगी
को
सूक्ष्म
से
महान
तक
का
बोध
कराता
है
श्लोक 1
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि योगस्य परमं पदम्।
येन विज्ञानमात्रेण जीवन्मुक्तो भवेद्ध्रुवम्॥
हिन्दी अर्थ:
हे देवी! अब मैं योग का वह परम रहस्य बताता हूँ, जिसे जान लेने मात्र से साधक निश्चित रूप से जीवन-मुक्त हो जाता है।
श्लोक 2
न जातिर्न च संप्रदायविषयः कोऽप्यस्य योगस्य वै
नैवाधीश्वरणो न वा बहुगुणः सत्त्वं न वा कर्मकृत्।
शुद्धो भक्तिपरः सदा गुरुगतो यः स्यात्स वै योगवित्
तस्माच्छुद्धतमेऽत्र लोके पुरुषे भक्तिं करोत्यादरात्॥
हिन्दी अर्थ:
इस योग में न कोई जाति का भेद है, न किसी संप्रदाय का। न ही अधिक धन, गुण, कुल या कर्म आवश्यक है। जो शुद्ध हृदय वाला, गुरु का भक्त और साधना में तत्पर हो – वही सच्चा योगी है।
श्लोक 3
शिवेनोक्तं महादेव्या योगं ज्ञानप्रदायकम्।
गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयमुद्धारकारणम्॥
हिन्दी अर्थ:
यह योग शिव ने स्वयं पार्वती को बताया था। यह ज्ञान देने वाला और आत्मोद्धार करने वाला है, जिसे पूरी तरह गोपनीय रखना चाहिए।
श्लोक 4
ज्ञानं योगेन संविद्यं योगो ज्ञानं समाश्रितम्।
एको धर्मः समायाति द्वयं योगप्रवर्तकम्॥
हिन्दी अर्थ:
योग ज्ञान पर आधारित है और ज्ञान योग पर। दोनों एक-दूसरे के सहायक हैं। दोनों के मेल से ही सच्चा धर्म प्रकट होता है।
श्लोक 5
शास्त्रेषु कृत्वा बुद्धिं यस्तु योगं न सेवते।
स पण्डितोऽपि मूर्खः स्याद्योगो ह्यस्यान्त्यगामिकः॥
हिन्दी अर्थ:
जो केवल शास्त्र पढ़ता है पर योग का अभ्यास नहीं करता, वह पंडित होते हुए भी मूर्ख है। क्योंकि अभ्यास के बिना योग सिद्ध नहीं होता।
श्लोक 6
यः पश्यत्यात्मनो योगं स ज्ञानं लभते ध्रुवम्।
ज्ञानी योगं समाश्रित्य स सम्पूर्णतया गतः॥
हिन्दी अर्थ:
जो आत्मा में योग को देखता है, वही सच्चा ज्ञान प्राप्त करता है। और जो ज्ञानी योग के मार्ग पर चलता है, वह पूर्णता को प्राप्त होता है।
श्लोक 7
न मुक्तिर्न च विज्ञानं योगं विना कदाचन।
न च योगो भवेद्विज्ञं विज्ञानं भक्तिसंयुतम्॥
हिन्दी अर्थ:
न तो मुक्ति संभव है, न ज्ञान, यदि योग न किया जाए। और योग भी तभी फलदायक होता है जब वह भक्ति और ज्ञान से युक्त हो।
श्लोक 8
योगेन विज्ञानयुक्तं मुक्तिं प्राप्नोति मानवः।
विज्ञानं योगयुक्तं च यत्र तत्र न संशयः॥
हिन्दी अर्थ:
जो योग को विज्ञान (तत्वज्ञान) से जोड़कर करता है, वह मनुष्य निश्चित रूप से मुक्ति को प्राप्त करता है। इसमें कोई संशय नहीं।
श्लोक 9
इदानीं शृणु तं योगं पावनं मरणान्तकम्।
येन विज्ञानमात्रेण जीवन्मुक्तो भवेद्ध्रुवम्॥
हिन्दी अर्थ:
अब उस योग को सुनो जो पवित्र है, मृत्यु का अंत करने वाला है। जिसे जान लेने मात्र से जीवित रहते ही मुक्ति प्राप्त होती है।
श्लोक 10
अथासने स्थिरो भूत्वा दृढबन्धो दृढेन्द्रियः।
चिन्तयेदात्मकं योगं वायुबन्धं समाचरेत्॥
हिन्दी अर्थ:
स्थिर आसन में बैठकर, इंद्रियों को नियंत्रित कर, और मन को एकाग्र कर योग का ध्यान करे और प्राण को बांधने की क्रिया (बन्ध) करे।
श्लोक 11
तत्रासीनः सुखं योगी निगृह्येन्द्रियगोचरम्।
बुद्ध्या तत्त्वं समाधाय शृणु वायोर्निग्रहम्॥
हिन्दी अर्थ:
योगी सुखपूर्वक बैठकर इंद्रियों को वश में करे और बुद्धि से तत्त्व (आत्मा) का ध्यान करते हुए प्राणवायु को नियंत्रित करे।
श्लोक 12
प्रथमं चित्ता समाहितं यदा स्याद्ध्रुवं स्थितम्।
तदा प्राणो भवेद्योगी स्थिरः स्थाणुवदाचलः॥
हिन्दी अर्थ:
जब योगी का चित्त पूर्ण रूप से एकाग्र हो जाता है, तभी उसका प्राण स्थिर होता है – जैसे कोई अचल वृक्ष।
श्लोक 13
यदा चित्तं स्थिरं कृत्वा वायवोऽपि स्थिरा भवन्ति।
तदा योगी भवेद्युक्तो न चलं वायुना भवेत्॥
हिन्दी अर्थ:
जब चित्त स्थिर होता है, तो प्राणवायु भी स्थिर हो जाती है। तभी योगी सच्चे योग से युक्त होता है और किसी गति से विचलित नहीं होता।
श्लोक 14
स्थिरं चित्तं स्थिरो वायुः स्थिरः स योग उच्यते।
चलं चित्तं चलो वायुः चलो योगो न सिद्ध्यति॥
हिन्दी अर्थ:
जब चित्त और वायु स्थिर हों, तभी उसे योग कहा जाता है। यदि चित्त चंचल हो तो योग सिद्ध नहीं होता।
श्लोक 15
यदा स्थाणुवदासीनः प्रायशो निःस्पृहो भवेत्।
तदा नाडीशुद्धिः स्यात्प्रत्यहं वायुनिग्रहात्॥
हिन्दी अर्थ:
जब योगी वृक्ष के समान स्थिर, निरासक्त होकर बैठता है और प्राणवायु को नियंत्रित करता है, तब उसकी नाड़ियाँ शुद्ध होती हैं।
श्लोक 16
तदा योगो भवेद्योगी वायुनाऽन्तर्गतं लयम्।
आनन्दं लभते योगी सुखं यत्र न विद्यते॥
हिन्दी अर्थ:
तब योगी को सच्चा योग प्राप्त होता है, जिसमें प्राण आंतरिक लय में स्थित होता है। तब वह परमानंद को प्राप्त करता है – ऐसा सुख जो वर्णनातीत है।
श्लोक 17
गच्छत्युरसि सम्प्राप्तं हृदि चन्द्रमसो लयम्।
प्रत्यहं योगिनां तस्मात्सुखं स्यान्निःस्पृहात्मनाम्॥
हिन्दी अर्थ:
जब योगी का प्राण उर:प्रदेश (हृदय) में चंद्रमा (मन) में लीन होता है, तब उसे प्रतिदिन अतुल सुख की अनुभूति होती है।
श्लोक 18
यदा यदा हृदि स्थित्वा वायुरभ्यासयोगतः।
सर्वदुःखविनिर्मुक्तः स योगी मुक्तिमश्नुते॥
हिन्दी अर्थ:
जब-जब प्राण हृदय में स्थिर होता है और अभ्यास के द्वारा वहां टिकता है, तब योगी सभी दुखों से मुक्त होकर मुक्ति को प्राप्त करता है।
श्लोक 19
स्वभावेनैव यः पश्येत्सर्वं तत्त्वेन चात्मनः।
तं नमामि सतां मध्ये आत्मज्ञं स्वात्मदर्शिनम्॥
हिन्दी अर्थ:
जो स्वाभाविक रूप से ही सब कुछ आत्मतत्त्व रूप में देखता है – मैं ऐसे आत्मज्ञानी योगी को प्रणाम करता हूँ।
श्लोक 20
एवं चित्तं स्थिरं कृत्वा योगी यत्नेन तत्त्वतः।
प्रत्यहं वायुनिग्रहं कुर्यादन्यायसाधनम्॥
हिन्दी अर्थ:
इस प्रकार योगी को यत्नपूर्वक चित्त को स्थिर कर, प्रतिदिन नियम से प्राण का नियंत्रण करना चाहिए – यह मुक्ति का श्रेष्ठ साधन है।
श्लोक 21
वायोरभ्यासतो योगी यदा सम्पूर्णनाडिषु।
चलनं तु समालम्भ्य लभतेऽखिलसिद्धयः॥
हिन्दी अर्थ:
जब योगी प्राणवायु का अभ्यास करता है और वह सारी नाड़ियों में सम्यक् रूप से प्रवाहित होती है, तब वह सभी सिद्धियाँ प्राप्त करता है।
श्लोक 22
नाडीशुद्धिः सदा कार्या ततश्च वायुधारणम्।
ततो लक्षं प्रयत्नेन प्राप्यते सिद्धिभाजनम्॥
हिन्दी अर्थ:
नाड़ियों की शुद्धि सदा करनी चाहिए। फिर प्राण को नियंत्रित कर लक्ष साध्य किया जाए, तब योगी सिद्धि का अधिकारी बनता है।
श्लोक 23
नाडीशुद्धिं बिना योगो न सिध्यति कदाचन।
तस्मात्तां शुद्धिमासाद्य सिद्धिर्भवति निश्चितम्॥
हिन्दी अर्थ:
जब तक नाड़ी शुद्ध नहीं होती, तब तक योग सिद्ध नहीं होता। इसलिए पहले नाड़ीशुद्धि को प्राप्त करो, फिर सिद्धि निश्चित है।
श्लोक 24
शरीरे तु स्थिता नाड्यः सूत्रवत्स्नायुवल्लता।
तासां मध्ये स्थितः साक्षात्सुषुम्णाख्यो महानडिः॥
हिन्दी अर्थ:
शरीर में नाड़ियाँ जाल के समान फैली हुई हैं, जैसे तंतु या लता हो। उनके मध्य में स्थित मुख्य नाड़ी सुषुम्ना कहलाती है।
श्लोक 25
इडा च वामतः प्रोक्ता पिङ्गला दक्षिणे स्थिता।
सुषुम्णा मध्यदेशे तु त्रिवेणी सा निगद्यते॥
हिन्दी अर्थ:
बाईं ओर इड़ा नाड़ी है, दाईं ओर पिंगला और मध्य में सुषुम्ना नाड़ी स्थित है। इस त्रिवेणी को ही योग में विशेष महत्व है।
श्लोक 26
इडा सोमात्मकं ज्ञेयं पिङ्गला तु रविः स्मृता।
सुषुम्णा शुद्धबुद्धिः स्यात्त्रयाणां मेलकोटिवत्॥
हिन्दी अर्थ:
इड़ा चंद्र स्वरूप है, पिंगला सूर्य स्वरूप और सुषुम्ना शुद्ध बुद्धि की प्रतीक है। ये तीनों मिलकर ज्ञान और योग का द्वार खोलते हैं।
श्लोक 27
वायोरभ्यासतो योगी यदा तिस्रोऽपि नाडिकाः।
प्रविष्टः सुषुम्णायां तदा सिद्धिं स वेत्ति वै॥
हिन्दी अर्थ:
जब योगी के प्राण का प्रवाह अभ्यास के द्वारा इन तीनों नाड़ियों को पार कर सुषुम्ना में प्रवेश करता है, तभी वह सिद्धि प्राप्त करता है।
श्लोक 28
विना सुषुम्णागमने न सिद्धिर्जायते क्वचित्।
तस्मात्सुषुम्णामार्गेण प्रवेक्ष्य वायुमन्वहम्॥
हिन्दी अर्थ:
सुषुम्ना में प्राण के प्रवेश के बिना सिद्धि संभव नहीं। इसलिए प्रतिदिन प्राण को सुषुम्ना मार्ग में प्रवाहित करना चाहिए।
श्लोक 29
वह्निस्थानं समाश्रित्य चिन्तयेदात्मतत्त्वकम्।
यत्र वह्निः स्थितो नित्यं तत्र प्राणं नियोजयेत्॥
हिन्दी अर्थ:
जहाँ अग्नि (मूलाधार का स्थान) स्थित है, वहाँ आत्मतत्त्व का ध्यान करते हुए प्राण को स्थिर करो। प्राण को वहीं स्थापित करो।
श्लोक 30
अग्निस्तिष्ठति नाभ्यां तु तत्रैव प्राणधारणम्।
एष योगो हि विज्ञेयो मरणं तत्र न विद्यते॥
हिन्दी अर्थ:
नाभि के समीप अग्नि स्थित है, वही प्राण का धारण स्थान है। जब प्राण वहीं स्थिर होता है, तब मृत्यु नहीं आती – यही सच्चा योग है।
श्लोक 31
प्राणो यस्य स्थितो नाभौ नायं म्रियते क्वचित्।
जीवन्तमक्षयं विद्याद्वह्निस्थानं स एव सः॥
हिन्दी अर्थ:
जिस योगी का प्राण नाभि में स्थित हो जाता है, वह अमरत्व को प्राप्त करता है – मृत्यु उसका स्पर्श नहीं करती।
श्लोक 32
प्रत्यहं स्यात्प्रयत्नेन वह्नौ तं धारणं कुरु।
जीवन्नेव स योगी तु मुक्तिं लभते निश्चितम्॥
हिन्दी अर्थ:
प्रत्येक दिन प्रयत्नपूर्वक प्राण को अग्नि स्थान में स्थिर करें। ऐसा योगी जीते-जी ही मुक्ति को प्राप्त कर लेता है।
श्लोक 33
तस्मात्स्वाधिष्ठानदेशे वह्निस्थाने प्रधारयेत्।
प्रत्यहं प्राणबुद्ध्यैव पवनं तं समाचरेत्॥
हिन्दी अर्थ:
इसलिए प्राण को स्वाधिष्ठान (अग्नि स्थान) में रखकर बुद्धि और ध्यान के साथ उसका अभ्यास करना चाहिए।
श्लोक 34
मूलाधारे स्थितं शक्तिं जाग्रयित्वा प्रयत्नतः।
ऊर्ध्वं नेतुं प्रयत्नेन वायुनोन्नमितं कुरु॥
हिन्दी अर्थ:
मूलाधार में स्थित शक्ति (कुंडलिनी) को प्रयत्नपूर्वक जाग्रत करो और प्राणवायु के बल से उसे ऊपर की ओर ले जाओ।
श्लोक 35
योगी यः समुपारूढो योगाभ्यासरतो मुने।
प्रत्यहं वायुमाकृष्य वह्निस्थानं नियोजयेत्॥
हिन्दी अर्थ:
जो मुनि योगाभ्यास में लगे हैं, उन्हें प्राण को प्रतिदिन अग्नि स्थान में स्थापित करना चाहिए।
श्लोक 36
सुषुम्णायां प्रविष्टोऽयं वायुः संचारहेतुकः।
प्रत्यहं कण्ठदेशं च हृदयं च समाश्रयेत्॥
हिन्दी अर्थ:
जब प्राण सुषुम्ना में प्रविष्ट हो जाता है, तब वह गले और हृदय को पार करता है – यही योग में चढ़ाव है।
श्लोक 37
ततः शीघ्रं समारूढो ब्रह्मरन्ध्रं प्रयाति सः।
वायुः सुषुम्णायां यत्र संचारं कुरुते मुने॥
हिन्दी अर्थ:
इसके बाद वह प्राण शीघ्र ही ब्रह्मरंध्र की ओर जाता है। यह तभी होता है जब प्राण सुषुम्ना में प्रवाहित होता है।
श्लोक 38
अविच्छिन्नप्रयत्नेन यो वायुः सुषुम्णया गतः।
प्रत्यहं प्रयतस्तस्य कालोऽपि भयप्रदः॥
हिन्दी अर्थ:
जो साधक नियमित अभ्यास से प्राण को सुषुम्ना में ले जाता है, उसके लिए मृत्यु का भी कोई भय नहीं रहता।
श्लोक 39
वह्निस्थानं समाश्रित्य वायुः सुषुम्णया गतः।
आत्मानं परमं ध्यायन्परं सुखमवाप्नुयात्॥
हिन्दी अर्थ:
जब प्राण अग्नि स्थान से उठकर सुषुम्ना में प्रवेश करता है और साधक आत्मा का ध्यान करता है, तब वह परम सुख को प्राप्त करता है।
श्लोक 40
वह्निस्थानं तु यः कुर्याद्वायोः संचारमुत्तमम्।
न स रोगं न दुःखं च न मरणं समश्नुते॥
हिन्दी अर्थ:
जो योगी प्राण को अग्नि स्थान में नियंत्रित करता है और सुषुम्ना में प्रवाहित करता है – वह रोग, दुःख और मृत्यु से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 41
प्रत्यहं प्रयतो योगी वह्निस्थाने नियोजयेत्।
वायुमाकर्षयेद्भालात्सुषुम्णायां निरन्तरम्॥
हिन्दी अर्थ:
योगी को प्रतिदिन प्रयत्नपूर्वक प्राण को अग्नि स्थान (मूलाधार) में स्थिर कर, उसे भाल (आज्ञा चक्र) की ओर सुषुम्ना के मार्ग से खींचते रहना चाहिए।
श्लोक 42
यदा गच्छेत्समं वायुः सुषुम्णामध्यमार्गगः।
तदा योगी विजानीयात्सिद्धं योगं च तत्त्वतः॥
हिन्दी अर्थ:
जब प्राण समान रूप से सुषुम्ना के मध्य मार्ग में प्रवाहित होने लगे, तब योगी को समझना चाहिए कि उसका योग सच्चे अर्थ में सिद्ध हो गया है।
श्लोक 43
यदा योगी महायोगी वायुमूर्ध्नि विधारयेत्।
तदा तस्य भवेन्मोक्षो नात्र कार्या विचारणा॥
हिन्दी अर्थ:
जब योगी अपने प्राण को मस्तक में स्थिर कर देता है, तब उसे निश्चित रूप से मोक्ष प्राप्त होता है – इसमें कोई संशय नहीं।
श्लोक 44
वायुः सुषुम्णायां नित्यमाचरत्यभ्यासतः शुभम्।
तदा सर्वाणि पापानि नश्यन्ति झटिति ध्रुवम्॥
हिन्दी अर्थ:
जब अभ्यास द्वारा प्राण सुषुम्ना में प्रवाहित होता है, तब योगी के सारे पाप शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 45
सुषुम्णायां प्रविष्टस्य प्राणस्य गतिरुद्धवा।
नित्यं भवेत्ततो योगी मुक्तो भवति पार्वति॥
हिन्दी अर्थ:
हे पार्वती! जब प्राण सुषुम्ना में प्रवेश करके सदा ऊर्ध्वगामी हो जाता है, तब योगी मुक्ति को प्राप्त करता है।
श्लोक 46
वह्निस्थाने समासीनं वायुमाकृष्य सर्वदा।
वह्निना दह्यते सर्वं तस्य दोषशतं ध्रुवम्॥
हिन्दी अर्थ:
जब योगी प्राण को अग्नि स्थान में लाकर स्थिर करता है, तब वह अग्नि उस योगी के सारे दोषों को भस्म कर देती है।
श्लोक 47
वह्निना दग्धसर्वाङ्गः सोमपानं प्रकल्पयेत्।
ततो योगी भवेद्योगी दीर्घमायुरवाप्नुयात्॥
हिन्दी अर्थ:
जब योगी का शरीर आंतरिक अग्नि से शुद्ध हो जाए, तब वह सोम (चन्द्र तत्त्व) को पी सकता है। इससे उसे दीर्घायु और सिद्धि प्राप्त होती है।
श्लोक 48
योगिनो योगसिद्ध्यर्थं सोमपानं प्रयत्नतः।
कुर्युः सदा महाभागास्तेन योगः प्रसीदति॥
हिन्दी अर्थ:
योग की सिद्धि के लिए योग्य योगियों को सोमपान (ब्रह्मरंध्र से टपकती अमृतधारा का अनुभव) करना चाहिए, जिससे योग साधना सफल होती है।
श्लोक 49
उपर्युपरि गच्छन्तं योगिनं प्राणवायुनि।
धावन्तं योगिनं प्राहुर्भैरवं पदमीश्वराः॥
हिन्दी अर्थ:
जब योगी का प्राण ऊपर की ओर चलता है, तब देवता कहते हैं कि यह योगी ‘भैरव पद’ (परम ब्रह्म) की ओर जा रहा है।
श्लोक 50
भैरवं पदमाज्ञाय योगी दीर्घायुरुच्यते।
सर्वरोगविनिर्मुक्तः सर्वदुःखविवर्जितः॥
हिन्दी अर्थ:
जो योगी भैरव पद (परब्रह्म स्थिति) को जान जाता है, वह दीर्घायु होता है, सभी रोगों और दुखों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 51
यदा कालाग्निसदृशं दीप्तं प्रज्वलितं मुखे।
दृश्यते योगिनो योगे तदा कालो न विद्यते॥
हिन्दी अर्थ:
जब योगी के मुख में अग्नि के समान तेज दिखाई देता है, तब समझना चाहिए कि वह काल (मृत्यु) से परे चला गया है।
श्लोक 52
तत्र दृष्टिं समास्थाय योगी योगपरायणः।
सर्वबन्धविनिर्मुक्तो ब्रह्मभावं नियच्छति॥
हिन्दी अर्थ:
योगी जब उस दिव्य प्रकाश में दृष्टि को टिकाकर ध्यान करता है, तब वह सारे बंधनों से मुक्त होकर ब्रह्मभाव में स्थित हो जाता है।
श्लोक 53
स्वदेहे सर्वमालोक्य योगी दिव्यचक्षुषा।
निःस्पृहो भवति क्षिप्रं परानन्दं निगच्छति॥
हिन्दी अर्थ:
जो योगी दिव्य दृष्टि द्वारा अपने शरीर में सब कुछ देखता है, वह संसार से विरक्त हो जाता है और शीघ्र ही परमानंद को प्राप्त करता है।
श्लोक 54
स्वदेहदाहसंयुक्तं वायुनाऽन्तर्गतेन च।
योगिनं विद्यते योगो मुक्त्यै स्यान्नात्र संशयः॥
हिन्दी अर्थ:
जब योगी के भीतर प्राणवायु अग्नि सहित चलती है और शरीर को शुद्ध करती है, तब वह योग मोक्षदायक होता है – इसमें कोई संदेह नहीं।
श्लोक 55
यदा वह्निः सदा नाभौ प्रज्वलत्यन्तरात्मनः।
तदा योगी भवेद्योगी नात्र कार्यं विचारणा॥
हिन्दी अर्थ:
जब नाभि के अंदर अग्नि सदा प्रज्वलित रहती है, तब वह साधक सच्चा योगी कहलाता है – इसमें कोई विचार करने की आवश्यकता नहीं।
श्लोक 56
नाभिदेशे हि या वह्निः प्रज्वलन्ती हि योगिनः।
सा भस्मीकुरुते पापं तेन सिद्धिर्न लभ्यते॥
हिन्दी अर्थ:
योगी की नाभि में जो अग्नि प्रज्वलित होती है, वह सभी पापों को भस्म कर देती है, जिससे योग सिद्ध होता है।
श्लोक 57
योगिनः सुषुम्णामार्गे यदा वायुः प्रवर्तते।
तदा सिद्धिर्भवेन्नित्यं ततः कालो न विद्यते॥
हिन्दी अर्थ:
जब योगी का प्राण सुषुम्ना मार्ग में प्रवाहित होता है, तब उसे नित्य सिद्धि प्राप्त होती है और फिर काल (मृत्यु) का भय नहीं रहता।
श्लोक 58
प्रत्यहं प्रयतो योगी वह्निस्थाने नियोजयेत्।
वायुमाकर्षयेद्यत्नात्तदा स्यात्सिद्धिरुत्तमा॥
हिन्दी अर्थ:
योगी को प्रतिदिन प्रयत्नपूर्वक प्राण को अग्नि स्थान में लाना चाहिए और प्रयासपूर्वक ऊपर खींचना चाहिए – तभी श्रेष्ठ सिद्धि प्राप्त होती है।
श्लोक 59
वह्निस्थानं समाश्रित्य नित्यं वायुनिग्रहात्।
योगिनां जायते बुद्धिः स्वतः सिद्धिर्न संशयः॥
हिन्दी अर्थ:
जब योगी निरंतर अग्नि स्थान पर प्राण को स्थिर करता है और उसे नियंत्रित करता है, तब उसमें दिव्य बुद्धि जाग्रत होती है और सिद्धि स्वाभाविक हो जाती है।
श्लोक 60
योगाभ्यासरतः शान्तो मिताहारः समाहितः।
सदा योगे स्थितो योगी शीघ्रमेव विमुच्यते॥
हिन्दी अर्थ:
जो योगी शांत, संयमी, मिताहारी और एकाग्र होकर नियमित योगाभ्यास करता है, वह शीघ्र ही मुक्ति को प्राप्त करता है।
श्लोक 61
अभ्यासेन सदा युक्तो योगी योगपरायणः।
प्राप्तवान्योगसिद्धिं च स जीवन्मुक्त उच्यते॥
हिन्दी अर्थ:
जो योगी निरंतर अभ्यास में लगा रहता है और योग में तल्लीन रहता है, वह योग सिद्ध कर लेता है और जीते-जी मुक्त हो जाता है।
श्लोक 62
वायोः प्रवेशनं कृत्वा योगी नाडीप्रवर्तकम्।
प्रत्यहं नियमं कृत्वा जीवन्मुक्तो न संशयः॥
हिन्दी अर्थ:
जो योगी नाड़ियों में प्राण का प्रवाह कर, प्रतिदिन नियमित साधना करता है, वह निश्चय ही जीवन्मुक्त कहलाता है।
श्लोक 63
नित्यं योगमथाभ्यास्य वह्निस्थाने नियोजयेत्।
प्राणं चन्द्रमसी स्थाप्य तत्रैव लयमावहेत्॥
हिन्दी अर्थ:
नित्य योगाभ्यास करके प्राण को अग्नि स्थान में स्थित करें, फिर उसे चंद्र (मस्तिष्क, सहस्रार) में लाकर वहीं लीन कर दें।
श्लोक 64
वह्निना लीयते प्राणस्ततो योगी महेश्वरः।
योगसिद्धिर्महाभागे न सन्देहः कदाचन॥
हिन्दी अर्थ:
जब प्राण अग्नि में लीन होता है, तब योगी स्वयं महेश्वर (ईश्वरस्वरूप) बन जाता है। तब योग सिद्ध होता है – इसमें कोई संदेह नहीं।
श्लोक 65
योगाभ्यासरतः शान्तो मिताहारः समाधिस्थः।
वह्निना लीयते चित्तं ततो योगः प्रवर्तते॥
हिन्दी अर्थ:
जो योगी शांत, संयमी, मिताहारी है और समाधि में स्थित रहता है, उसका चित्त अग्नि में लीन हो जाता है और तब योग सच्चे रूप में फलित होता है।
श्लोक 66
यः प्रयत्नं समारभ्य प्राप्नोति लयमात्मनः।
स एव योगवित्प्राज्ञो जीवन्मुक्तः स एव हि॥
हिन्दी अर्थ:
जो प्रयत्नपूर्वक आत्मा में लय प्राप्त कर लेता है, वही सच्चा योगी, ज्ञानी और जीवन्मुक्त होता है।
श्लोक 67
वह्निस्थाने सदा योगी प्राणं संस्थाप्य यत्नतः।
तं च वायुमथाकृष्य स्थापयेद्भ्रूमध्ये शनैः॥
हिन्दी अर्थ:
योगी को प्राण को पहले अग्नि स्थान में स्थापित करना चाहिए और फिर धीरे-धीरे उसे खींचकर भ्रूमध्य (आज्ञा चक्र) में लाना चाहिए।
श्लोक 68
तत्र प्राणं स्थिरीकृत्य चिन्तयेदात्मतत्त्वकम्।
ततोऽनन्तं परं ब्रह्म तेन योगः प्रवर्तते॥
हिन्दी अर्थ:
जब योगी प्राण को भ्रूमध्य में स्थिर करता है और आत्मतत्त्व का ध्यान करता है, तब वह परम ब्रह्म का अनुभव करता है और योग सिद्ध होता है।
श्लोक 69
मूर्ध्नि प्राणं सदा कृत्वा चित्तं चैव समाहितम्।
दृष्टिं च भ्रूमध्ये स्थाप्य परं ब्रह्माधिगच्छति॥
हिन्दी अर्थ:
जो योगी प्राण को मस्तक में, चित्त को एकाग्र और दृष्टि को भ्रूमध्य में रखता है, वह परम ब्रह्म को प्राप्त करता है।
श्लोक 70
नाडीशुद्धिं सदा कुर्याद्वायुनो निग्रहं तथा।
ततः पश्चात्समाचार्य योगमार्गं समाचरेत्॥
हिन्दी अर्थ:
प्रथम नाड़ियों की शुद्धि और प्राणवायु का नियंत्रण करें, फिर योग के अन्य मार्गों का पालन करना चाहिए।
श्लोक 71
नाडीशुद्धे सदा योगी यदा स्यात्संयतः स्वयम्।
वायुरेति सुषुम्णायां तदा योगोऽधिगम्यते॥
हिन्दी अर्थ:
जब योगी की नाड़ियाँ शुद्ध हो जाती हैं और वह स्वयं संयमित रहता है, तब उसका प्राण सुषुम्ना में प्रवेश करता है और योग सिद्ध होता है।
श्लोक 72
वायोः प्रवेशनं यत्र सुषुम्णायां निरन्तरम्।
तत्रैव लीयते चित्तं ततः कालो न विद्यते॥
हिन्दी अर्थ:
जहाँ प्राण सुषुम्ना में निरंतर प्रवाहित होता है, वहीं चित्त भी लीन हो जाता है – तब मृत्यु का भय नहीं रहता।
श्लोक 73
वह्निस्थाने सदा तिष्ठेद्योगी प्राणं नियोजयेत्।
तत्रैव लीयते चित्तं ततः सिद्धिर्भवत्यलम्॥
हिन्दी अर्थ:
योगी को प्राण को सदैव अग्नि स्थान में स्थिर करना चाहिए, वहाँ चित्त भी लीन हो जाता है – तभी पूर्ण सिद्धि प्राप्त होती है।
श्लोक 74
वायुनैव प्रवेणैव वह्निस्तिष्ठति नित्यशः।
वह्निना लीयते चित्तं ततः कालो न विद्यते॥
हिन्दी अर्थ:
प्राण के माध्यम से अग्नि स्थिर रहती है। जब चित्त उस अग्नि में लीन हो जाता है, तब योगी काल (मृत्यु) से परे हो जाता है।
श्लोक 75
एवं योगं समारुह्य योगी मुक्तो भवेद्ध्रुवम्।
स जीवन्मुक्त इत्युक्तो नायं म्रियते क्वचित्॥
हिन्दी अर्थ:
जो योगी इस प्रकार योग की उच्च स्थिति को प्राप्त कर लेता है, वह निश्चित रूप से जीवन्मुक्त हो जाता है और उसे मृत्यु नहीं होती।
श्लोक 76
यः कदाचिद्दशां प्राप्तो योगिनां परिकल्पिताम्।
स जीवन्मुक्त एव स्याद्भवपाशान्न बध्यते॥
हिन्दी अर्थ:
जो योगी कभी भी उस परम योग दशा को प्राप्त कर लेता है, वह सदा के लिए जीवन्मुक्त हो जाता है और जन्म-मरण के बंधन में नहीं फंसता।
श्लोक 77
योगाभ्यासेन महता वायोरनिलनिग्रहात्।
मृत्युञ्जयो भवेद्योगी तस्माद्योगं समाचरेत्॥
हिन्दी अर्थ:
प्रबल योगाभ्यास और प्राणनिग्रह से योगी मृत्यु को जीत लेता है। इसलिए योग का अभ्यास आवश्यक है।
श्लोक 78
प्रत्यहं वायुनिग्रहं कुर्याद्योगविभूतये।
विना वायुनिग्रहं तु योगसिद्धिर्न जायते॥
हिन्दी अर्थ:
प्रत्येक दिन योगी को प्राणनिग्रह करना चाहिए। इसके बिना योग सिद्ध नहीं होता।
श्लोक 79
वायोरभ्यासतो योगी सिद्धिं प्राप्नोति निश्चितम्।
विना वायुप्रवेशेन न सिध्यत्येव योगवित्॥
हिन्दी अर्थ:
प्राणवायु के अभ्यास से योगी निश्चय ही सिद्धि को प्राप्त करता है। बिना प्राण के सुषुम्ना में प्रवेश के योग सिद्ध नहीं होता।
श्लोक 80
वायुनो लयनं यत्र तत्र चित्तं लयं गतम्।
चित्तलयात्सदा मुक्तिर्भवपाशान्न बध्यते॥
हिन्दी अर्थ:
जहाँ प्राण लीन होता है, वहीं चित्त भी लीन होता है। जब चित्त लय को प्राप्त करता है, तब जीव जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 81
वह्निना लीयते वायुः सोऽग्निः स्याच्च दिवाकरः।
प्रकाशरूपिणं तं च योगिनं भावयेत्सदा॥
हिन्दी अर्थ:
जब प्राण अग्नि में लीन होता है, तब वह अग्नि सूर्य के समान प्रकाशमय बन जाती है। योगी को सदैव उस प्रकाशस्वरूप अवस्था का ध्यान करना चाहिए।
श्लोक 82
तत्रैव लीयते वायुः स योगी सिद्धिमाप्नुयात्।
योगाभ्यासेन महता जीवन्मुक्तो न संशयः॥
हिन्दी अर्थ:
जब प्राण उस प्रकाश में लीन होता है, तो योगी सिद्धि को प्राप्त करता है। प्रबल योगाभ्यास से वह निःसंदेह जीवन्मुक्त हो जाता है।
श्लोक 83
वह्निस्तिष्ठति यत्रैव वायुस्तत्रैव लीयते।
वह्निना लीयते चित्तं ततः सिद्धिर्भवत्यलम्॥
हिन्दी अर्थ:
जहाँ अग्नि स्थित है, वहीं प्राण लीन होता है। जब चित्त भी अग्नि में लीन होता है, तब सिद्धि प्राप्त होती है।
श्लोक 84
योगेन चित्तमेकाग्रं कुर्याद्योगं समाचरेत्।
विना चित्तैकतां योगो न सिध्यति कथञ्चन॥
हिन्दी अर्थ:
चित्त को एकाग्र करके योग का अभ्यास करना चाहिए, क्योंकि चित्त की एकाग्रता के बिना योग सिद्ध नहीं होता।
श्लोक 85
चित्तैक्यं हि सदा कुर्यात्तन्मुक्तेः कारणं परम्।
योगमार्गे प्रतिष्ठानं योगिनां च महाफलम्॥
हिन्दी अर्थ:
चित्त की एकता ही मुक्ति का परम कारण है। योगमार्ग में यही आधार और योगियों का महान फल है।
श्लोक 86
शरीरं साधनं योगे तन्मार्गे स्थापयेद्ध्रुवम्।
योगिनां च सदा रक्ष्यं योगसिद्धिं च साधयेत्॥
हिन्दी अर्थ:
योग में शरीर साधन है। इसे सधारकर योग के मार्ग में स्थिर करना चाहिए और योग की सिद्धि प्राप्त करनी चाहिए।
श्लोक 87
नित्यं योगमथाभ्यास्य योगी युक्तो भवेत्तदा।
विना योगं तु विप्राणां मुक्तिर्न सिध्यति ध्रुवम्॥
हिन्दी अर्थ:
योगी को नित्य योगाभ्यास करना चाहिए, तभी वह सच्चे अर्थों में योगयुक्त होता है। बिना योग के ज्ञानियों की भी मुक्ति निश्चित नहीं होती।
श्लोक 88
शिववाक्यं सदा कुर्यात्तन्मार्गे यः प्रतिष्ठितः।
स एव मुक्तिमाप्नोति नान्यः कश्चिद्धि साधकः॥
हिन्दी अर्थ:
जो शिववाणी (शिव द्वारा बताए गए मार्ग) पर चलता है, वही मुक्ति प्राप्त करता है। कोई और मार्ग इसकी तुलना में सफल नहीं होता।
श्लोक 89
वेदशास्त्रपुराणानि सम्यग्भावेन योऽधिगम्।
शिववाक्यं न जानाति न स योगी न वै द्विजः॥
हिन्दी अर्थ:
जो व्यक्ति वेद, शास्त्र और पुराणों को पढ़ता है लेकिन शिववाणी (योग का सार) नहीं जानता – वह न तो सच्चा योगी है और न ही ब्राह्मण।
श्लोक 90
योगविज्ञानहीनो यो यमानीमसमाचरन्।
न तेन मुक्तिमाप्नोति जन्मकोटिशतैरपि॥
हिन्दी अर्थ:
जो योग का सच्चा ज्ञान नहीं रखता और यम-नियम का पालन नहीं करता, वह लाखों जन्मों में भी मुक्ति नहीं प्राप्त कर सकता।
श्लोक 91
प्रथमं यमनीमं च ततः शुद्धिं समाचरेत्।
ततः कुम्भकयोगं च ततः सिद्धिं समाचरेत्॥
हिन्दी अर्थ:
सबसे पहले यम-नियम का पालन करना चाहिए, फिर नाड़ीशुद्धि और कुम्भक (प्राणायाम) का अभ्यास। इसके बाद योग सिद्ध होता है।
श्लोक 92
योगसिद्धिं समारुह्य तिष्ठेन्मुक्तो भवेत्तदा।
स जीवन्मुक्त एव स्याद्देहेन सह मोदते॥
हिन्दी अर्थ:
योग सिद्ध होने पर योगी स्थिर हो जाता है और तभी वह जीवन्मुक्त होता है – अर्थात शरीर रहते हुए भी आनंद में स्थित रहता है।
श्लोक 93
यः शिवं नाभिजानाति न स योगीति कथ्यते।
न वेदान्तविदं ब्रूयात्तं पाखण्डं च तं वदेत्॥
हिन्दी अर्थ:
जो शिवतत्त्व को नहीं जानता, वह योगी नहीं कहा जा सकता। उसे वेदान्तज्ञ भी नहीं कहना चाहिए, वह केवल पाखंडी है।
श्लोक 94
शिवज्ञानं सदा कुर्यात्तद्विना मुक्तिरुच्यते।
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन शिवं ज्ञानं समाचरेत्॥
हिन्दी अर्थ:
शिवज्ञान का अभ्यास करना चाहिए, क्योंकि इसके बिना मुक्ति नहीं संभव। अतः शिवज्ञान को हर प्रकार से प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए।
श्लोक 95
गुरुभक्तिर्भवेत्पूर्वं ततः शिवं च चिन्तयेत्।
गुरुहीनो न योगी स्यात्तस्मात्तं पूजयेद्ध्रुवम्॥
हिन्दी अर्थ:
सबसे पहले गुरु के प्रति भक्ति होनी चाहिए, फिर शिव का ध्यान करना चाहिए। गुरु के बिना योग सिद्ध नहीं होता – इसलिए उसकी पूजा अवश्य करें।
श्लोक 96
गुरुं विना न सिद्धिर्हि न योगो न च मुक्तितः।
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन गुरुं पूजयेत्सदा॥
हिन्दी अर्थ:
गुरु के बिना न तो सिद्धि मिलती है, न योग, और न मुक्ति। इसलिए हर प्रयास से गुरु की सच्चे मन से पूजा करनी चाहिए।
श्लोक 97
शिववाक्यं गुरोर्वाक्यं योगिनां मार्गदर्शकम्।
तस्मात्सत्कल्पवाक्यानि सदा कुर्यात्सुधीर्जनः॥
हिन्दी अर्थ:
गुरु का वचन ही शिव का वचन है और योगियों का मार्गदर्शक है। इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति को गुरु के उपदेशों का पालन करना चाहिए।
श्लोक 98
ज्ञानं चैतन्यमित्युक्तं जीवो ब्रह्मेति निश्चितम्।
तस्मादज्ञानहन्त्री या सा विद्या परिकीर्तिता॥
हिन्दी अर्थ:
ज्ञान ही चेतना है, और जीव ही ब्रह्म है – यह निश्चित है। जो अज्ञान को मिटा दे, वही सच्ची विद्या है।
श्लोक 99
ब्रह्मैवाहं सदा योगी ज्ञात्वा योगं समाचरेत्।
एवं ज्ञात्वा सदा योगी मुक्तो भवति निश्चलः॥
हिन्दी अर्थ:
"मैं ही ब्रह्म हूँ" – इस भाव को जानकर योगी को योग का अभ्यास करना चाहिए। इस ज्ञान से योगी निश्चल और मुक्त हो जाता है।
श्लोक 100
एवं शिवेन कथितं योगशास्त्रं सनातनम्।
गुप्तं च यत्नतो रक्ष्यं न देयं यस्य कस्यचित्॥
हिन्दी अर्थ:
यह योगशास्त्र शिव द्वारा बताया गया सनातन ज्ञान है। इसे गुप्त रखना चाहिए और अयोग्य व्यक्ति को नहीं देना चाहिए।
श्लोक 101
गुह्याद्गुह्यतमं देवि ददामि योगसिद्धये।
योगिनां मोक्षमात्रं च शिववाक्यं न संशयः॥
हिन्दी अर्थ:
हे देवी! यह अत्यंत गोपनीय ज्ञान है, जिसे मैं योग की सिद्धि के लिए देता हूँ। शिव का यह वचन ही योगियों को मुक्ति देने वाला है – इसमें कोई संदेह नहीं।
शिव संहिता – अध्याय 3 (Shiva Samhita
Chapter 3)
विषय:
यह अध्याय योग
का अभ्यास, गुरु की महिमा, आष्टांग योग, और ध्यान-साधना की विधियों का
विस्तारपूर्वक वर्णन करता है।
इसमें बताया गया है
कि योग कैसे
किया जाए, किन नियमों
का पालन करना
चाहिए, और किस प्रकार
ध्यान से सिद्धियाँ प्राप्त
होती हैं।
🔷 मुख्य
बिंदु:
1. गुरु की महिमा:
o
योग
सीखने के लिए योग्य
गुरु अनिवार्य है।
o
गुरु
के वचनों का
पालन करने से योग
सिद्ध होता है।
2. आष्टांग योग का वर्णन:
o
यम
(अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य,
दया आदि)
o
नियम
(शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय,
ईश्वर प्रणिधान)
o
आसन,
प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि
3. योगाभ्यास की विधि:
o
एकांत,
पवित्र स्थान में सुबह
योग करें।
o
मन
और इन्द्रियों को
संयम में रखकर अभ्यास
करें।
4. ध्यान का महत्व:
o
ध्यान
से चित्त एकाग्र
होता है।
o
एकाग्र
चित्त से धीरे-धीरे
सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।
5. आसन का लक्षण:
o
स्थिर,
सुखद और शरीर को
न थकाने वाला
आसन उत्तम है।
o
गुरु
के निर्देशानुसार ही
योग साधना करनी चाहिए।
श्लोक 1
श्रीदेव्युवाच –
योगस्य लक्षणं ब्रूहि सर्वेषां योगिनां प्रभो।
संशयच्छेदकं यत्तु श्रुत्वा मुच्येत बन्धनात्॥
हिन्दी अर्थ:
देवी ने कहा – हे प्रभो! कृपया योग का लक्षण (स्वरूप) बताइए, जिससे सभी योगियों का संशय दूर हो जाए और जो सुनकर व्यक्ति बंधन से मुक्त हो जाए।
श्लोक 2
श्रीभगवानुवाच –
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि योगं योगविदां वरम्।
दुर्लभं सर्वभूतानां ब्रह्माद्यैरपि सुदुर्लभम्॥
हिन्दी अर्थ:
भगवान शिव ने कहा – हे देवी! मैं अब वह योग बताने जा रहा हूँ जो योगियों में भी श्रेष्ठ है। यह समस्त प्राणियों के लिए दुर्लभ है और ब्रह्मा आदि के लिए भी अत्यंत कठिन है।
श्लोक 3
न वक्तव्यं न वाच्यं च न वक्तव्यं विशेषतः।
अन्येभ्यो ह्यल्पबुद्धेभ्यः स्वलाभाय प्रयोजयेत्॥
हिन्दी अर्थ:
इस योग का रहस्य न तो किसी को बताना चाहिए, न ही विशेष रूप से वर्णन करना चाहिए। अल्पबुद्धि लोगों को यह ज्ञान नहीं देना चाहिए – इसका उपयोग केवल आत्मकल्याण के लिए किया जाना चाहिए।
श्लोक 4
यो ददाति गुरोर्वाक्यं तं योगं विन्दते ध्रुवम्।
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन गुरोः सेवां समाचरेत्॥
हिन्दी अर्थ:
जो गुरु के वचनों का पालन करता है, वह निश्चित रूप से योग को प्राप्त करता है। इसलिए सभी प्रयत्नों से गुरु की सेवा करनी चाहिए।
श्लोक 5
गुरुभक्तिसमायुक्तो योगमार्गे विचक्षणः।
योगमेव सदा कुर्याद्योगसिद्धिं स मृच्छति॥
हिन्दी अर्थ:
जो व्यक्ति गुरु-भक्ति से युक्त और योगमार्ग में निपुण होता है, वह सदा योग का अभ्यास करता है और योग की सिद्धि को प्राप्त करता है।
श्लोक 6
यमादीन्यष्टधा तत्त्वं विनियोगं प्रवक्ष्यते।
प्रथमं संयमं कुर्यात्ततो योगं समाचरेत्॥
हिन्दी अर्थ:
अब आठ अंगों वाले योग (अष्टांग योग) के यम आदि तत्वों की व्याख्या की जाएगी। पहले संयम (नियंत्रण) करना चाहिए, फिर योग का अभ्यास करना चाहिए।
श्लोक 7
अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यमसंयमः।
दया क्षमा च माङ्गल्यं यमाः स्युः सर्वयोगिनाम्॥
हिन्दी अर्थ:
अहिंसा (किसी को कष्ट न देना), सत्य, चोरी न करना, ब्रह्मचर्य (संयम), दया, क्षमा, और शुभ भावना – ये सभी योगियों के लिए यम कहलाते हैं।
श्लोक 8
शौचसंतोषतपःस्वाध्यायेश्वरपुजनम्।
एतानि नियमांश्चैव योगे दृष्टा मनीषिभिः॥
हिन्दी अर्थ:
शरीर और मन की शुद्धता (शौच), संतोष, तपस्या, स्वाध्याय (शास्त्रों का अध्ययन), और ईश्वर का पूजन – ये नियम हैं, जिन्हें योग के ज्ञाताओं ने आवश्यक माना है।
श्लोक 9
आसनानि तु सर्वाणि यानि शास्त्रेषु निर्दिष्टानि।
तेषां तत्त्वं प्रवक्ष्यामि यथासम्भववर्णनम्॥
हिन्दी अर्थ:
अब मैं उन आसनों का वर्णन करूँगा जो शास्त्रों में बताये गए हैं, और जैसा संभव हो सके, उनका सार स्पष्ट करूँगा।
श्लोक 10
आसनं स्थिरसुखं प्रोक्तं हितं नाड्याः प्रसाधनम्।
गुरूक्तमार्गेणैव संप्रयुञ्जीत योगवित्॥
हिन्दी अर्थ:
जो आसन स्थिर और सुखद हो, और जो नाड़ियों को शुद्ध करने में सहायक हो – उसे ही उपयुक्त आसन माना गया है। योग का ज्ञाता इसे गुरु द्वारा बताए गए मार्ग से ही करे।
श्लोक 11
आसनं तु परं ज्ञेयं तेन वायुं नियच्छति।
वायुनिश्चितचित्तस्य लयः स्यान्नात्र संशयः॥
हिन्दी अर्थ:
आसन को परम ज्ञान के रूप में जानना चाहिए, क्योंकि उसी से वायु (प्राण) का नियंत्रण होता है। वायु को नियंत्रित करने से चित्त का लय (एकाग्रता में विलय) होता है – इसमें कोई संदेह नहीं।
श्लोक 12
चले वाते चलं चित्तं निश्चले निश्चलं भवेत्।
योगी स्थाणुत्वमाप्नोति ततो वायुं निरोधयेत्॥
हिन्दी अर्थ:
जब प्राणवायु चलता है तो चित्त भी चंचल होता है; और जब वायु स्थिर हो जाती है, तो चित्त भी स्थिर हो जाता है। योगी अचलता (स्थिरता) को प्राप्त करता है, इसलिए वायु को रोकना चाहिए।
श्लोक 13
यावद्वायुः स्थितो देहे तावज्जीवनमुच्यते।
मरणं तस्य निष्क्रान्तिस्ततो वायुं निरोधयेत्॥
हिन्दी अर्थ:
जब तक वायु शरीर में स्थित रहती है, तब तक जीवन कहा जाता है। जैसे ही वायु बाहर निकलती है, मरण हो जाता है – इसलिए वायु को नियंत्रित करना चाहिए।
श्लोक 14
यावच्चित्तं स्थिरं कार्यं यावद्वायुः प्रतिष्ठितः।
वायोश्चलनमभ्येति योगी योगफलं लभेत्॥
हिन्दी अर्थ:
जब तक चित्त और वायु स्थिर नहीं होते, योग सफल नहीं होता। वायु का चंचल होना योग की सिद्धि में बाधक है – इसे रोककर योगी फल प्राप्त करता है।
श्लोक 15
प्राणायामं तु यत्नेन संयम्य नियमेन च।
यदा यथोचितं कुर्याद्वशी स्यात्सर्वकर्मणाम्॥
हिन्दी अर्थ:
प्राणायाम को यत्नपूर्वक और नियम के साथ करना चाहिए। जब साधक इसे यथाविधि करता है, तो वह समस्त कर्मों का स्वामी हो जाता है।
श्लोक 16
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥
हिन्दी अर्थ:
जो व्यक्ति आहार, विहार, कर्म, निद्रा और जागरण में संतुलित होता है – उसके लिए योग दुखों को नष्ट करने वाला बनता है।
श्लोक 17
अत्याशिनः प्रयत्नस्य योगो न सिध्यति क्वचित्।
यः सदा सम्यगाचारी न स योगात्पराङ्मुखः॥
हिन्दी अर्थ:
जो अत्यधिक भोजन करता है या आवश्यकता से अधिक परिश्रम करता है, उसका योग सिद्ध नहीं होता। लेकिन जो संयमित आचरण करता है, वही योग से विमुख नहीं होता।
श्लोक 18
न विना यम-नियमौ सिद्धिर्भवति कर्हिचित्।
तस्मात्सदा प्रयत्नेन यम-नियममाचरेत्॥
हिन्दी अर्थ:
यम और नियम के बिना कभी भी योगसिद्धि नहीं होती। इसलिए साधक को सदा इनका अभ्यास करना चाहिए।
श्लोक 19
श्रद्धाभक्तिसमायुक्तो योगी यम-नियमक्रमम्।
गुरूपदेशतः कृत्वा योगसिद्धिमवाप्नुयात्॥
हिन्दी अर्थ:
जो योगी श्रद्धा और भक्ति से युक्त होकर, गुरु के उपदेशानुसार यम-नियम का पालन करता है, वही योगसिद्धि को प्राप्त करता है।
श्लोक 20
गुरोर्निर्देशमालम्ब्य सम्यगाचरतो मुनेः।
योगसिद्धिर्भवेन्नित्यं नात्र कार्या विचारणा॥
हिन्दी अर्थ:
जो मुनि गुरु के निर्देशों का पालन करते हुए योग का सम्यक अभ्यास करता है, उसे निश्चित रूप से योगसिद्धि प्राप्त होती है – इसमें कोई संदेह नहीं।
श्लोक 21
शरीरमध्यमं ज्ञेयं साधनानां मुमुक्षुणा।
तस्मात्तदेव रक्ष्यं हि नीत्या युक्त्या च सिद्धये॥
हिन्दी अर्थ:
जो व्यक्ति मुक्ति की इच्छा रखता है, उसे शरीर को एक माध्यम समझते हुए साधना करनी चाहिए। इसलिए शरीर की रक्षा नित्य और उचित विधियों से करनी चाहिए।
श्लोक 22
नास्त्यसंशययोगस्य समं योगं परं शुभम्।
प्रत्यहं साधयेद्योगं कालान्नियतमानसः॥
हिन्दी अर्थ:
संशयरहित योग के समान कोई और श्रेष्ठ, कल्याणकारी मार्ग नहीं है। इसलिए साधक को प्रतिदिन योगाभ्यास करना चाहिए और समय का पालन करना चाहिए।
श्लोक 23
कामक्रोधलोभमोहमानमात्सर्यशङ्कया।
विचारं कुरुते यो हि स योगी न च सिध्यति॥
हिन्दी अर्थ:
जो व्यक्ति काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, ईर्ष्या और शंका के अधीन होकर योग करता है, वह योगी कहलाने योग्य नहीं और न ही उसे सिद्धि मिलती है।
श्लोक 24
आत्मज्ञानं विना मुक्तिर्नास्ति योगेन सिद्धये।
यत्कृतं ध्यानमात्रेण मुच्यते बन्धनात्स्थिरः॥
हिन्दी अर्थ:
आत्मज्ञान के बिना मुक्ति नहीं होती। योग के अभ्यास से ध्यान उत्पन्न होता है, और जो ध्यान में स्थिर होता है, वह बंधन से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 25
ज्ञानमूलं तु योगं स्याद्ध्यानं तु फलमुच्यते।
ध्यानमूलं पुनस्तत्त्वं ज्ञानं चैकं तु सिध्यति॥
हिन्दी अर्थ:
योग का मूल ज्ञान है, और उसका फल ध्यान है। ध्यान का मूल तत्व है, और ज्ञान से ही सिद्धि प्राप्त होती है।
श्लोक 26
न च योगो विना ज्ञानं न च ज्ञानं विना पुनः।
योगो ज्ञानं च तत्त्वज्ञो योगिनां परमं पदम्॥
हिन्दी अर्थ:
योग बिना ज्ञान के और ज्ञान बिना योग के संभव नहीं। योग और ज्ञान दोनों को जानने वाला तत्वज्ञानी योगी ही परम अवस्था को प्राप्त करता है।
श्लोक 27
ज्ञानं योगं समाश्रित्य ध्यानं कुर्यान्निरन्तरम्।
तद्वशीकृतचित्तो हि योगसिद्धिं प्रपद्यते॥
हिन्दी अर्थ:
ज्ञान और योग का सहारा लेकर निरंतर ध्यान करना चाहिए। जब चित्त वश में आ जाता है, तब योगी योग की सिद्धि को प्राप्त करता है।
श्लोक 28
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।
बन्धाय विषयासक्तं मुक्त्यै निर्विषयं स्मृतम्॥
हिन्दी अर्थ:
योग
और ध्यान की
साधना में मन के महत्व
को स्पष्ट करता
है। मन अगर विषयों में
उलझा रहेगा, तो
आत्मज्ञान संभव नहीं।
लेकिन यदि मन को विषयों
से हटा लिया
जाए, तो वही मुक्ति का
मार्ग बन जाता है।
श्लोक 29
मनः प्रसन्नमत्यन्तं यत्र यत्र नियोजयेत्।
तत्र तत्र लयं याति योगिनां चित्तगोचरम्॥
हिन्दी अर्थ:
जहाँ-जहाँ मन अत्यंत प्रसन्न होकर स्थिर होता है, वहीं-वहीं वह लय को प्राप्त करता है, और यही योगियों के चित्त की गति है।
श्लोक 30
यथा दीपो निराशङ्को वायूनालोकसंस्थितः।
तथैव योगिनो ध्यानं निर्मलं स्थिरमादिशेत्॥
हिन्दी अर्थ:
जैसे बिना हिले दीपक की ज्योति वायुहीन स्थान में स्थिर रहती है, वैसे ही योगी का ध्यान भी निर्मल और अचल होना चाहिए।
नैव चिन्ता न च ग्लानिर्न च निद्रा न संज्वरः।
न नाशो न च वै भीतिर्न योगी योगतो भवेत्॥
हिंदी अर्थ:
योगी को न तो चिंता होती है, न थकान या अवसाद, न नींद अत्यधिक होती है, न रोग का भय रहता है, न मृत्यु का डर। योग से युक्त योगी इन सबसे परे होता है।
श्लोक 32
योगेन रहितो मूढो निन्दां स्तुतिमुपेक्षते।
हिंसां च परित्यज्यैव सदा शान्तो भवेद्यति:॥
हिंदी अर्थ:
जो योग से रहित और मूढ़ होता है, वह स्तुति और निंदा दोनों को लेकर उलझता है। लेकिन सच्चा साधक हिंसा को त्यागकर सदा शांत रहता है।
श्लोक 33
अभावे विषयाणां तु योग एषा सनातनः।
सर्वज्ञत्वं ततः प्राप्य ततः परमं पदम्॥
हिंदी अर्थ:
जब विषयों की इच्छा समाप्त हो जाती है, तब जो स्थिति प्राप्त होती है वही सनातन योग है। उस स्थिति से योगी सर्वज्ञ हो जाता है और फिर परम पद (मोक्ष) प्राप्त करता है।
श्लोक 34
योगेन रहितो मूढो विषयासक्तचेतनः।
प्रायो मरणमाप्नोति संसारं चाधिगच्छति॥
हिंदी अर्थ:
जो योग से रहित, विषयों में आसक्त और अज्ञानी होता है, वह मृत्यु को प्राप्त करता है और फिर संसार (जन्म-मरण) में उलझ जाता है।
श्लोक 35
योगाभ्यासेन योगीन्द्रो विषयेष्वनपेक्षितः।
विचरत्यखिलेष्वेव लीलया विगतक्लमः॥
हिंदी अर्थ:
योगाभ्यास से योगी विषयों के प्रति निरासक्त हो जाता है। वह सभी कार्यों में सहजता से, बिना किसी थकावट या क्लेश के विचरण करता है।
श्लोक 36
योगमेव परं विद्धि योगिनां मोक्षसाधनम्।
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन प्रयत्नो योगसाधने॥
हिंदी अर्थ:
योग ही योगियों के लिए सर्वोच्च मोक्ष का साधन है। इसलिए हर प्रकार से प्रयत्न करके योग की साधना करनी चाहिए।
श्लोक 37
शरीरेन्द्रियदुर्बल्यं व्याधयो विविधाः परे।
विहाय सर्वदा योगी युञ्जीतैव निरन्तरम्॥
हिंदी अर्थ:
योगी को शरीर और इन्द्रियों की दुर्बलता और रोगों को छोड़कर निरंतर योग का अभ्यास करना चाहिए।
श्लोक 38
पातकैः क्लिश्यते देहो दुर्बुद्ध्या च नश्यति।
तस्मात्पातककार्याणि त्यक्त्वा योगं समाचरेत्॥
हिंदी अर्थ:
पापकर्मों से शरीर दुःख पाता है और दुर्बुद्धि से नष्ट हो जाता है। इसलिए पाप के कार्यों को त्यागकर योग का अभ्यास करना चाहिए।
श्लोक 39
शुद्धभावः सदाचारी सत्त्वशुद्धिकरो यतिः।
एकान्ते वासमास्थाय युञ्जीत नियमं यमम्॥
हिंदी अर्थ:
शुद्ध भाव वाला, सदाचारी और सात्विक साधक, एकांत में निवास करके यम और नियम का पालन करते हुए योग साधना करे।
श्लोक 40
आसनं पवनं चैव प्रत्याहारं तथैव च।
धारणा ध्यायनं चैव समाधिं च समाचरेत्॥
हिंदी अर्थ:
साधक को आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि – इन सभी अंगों का अभ्यास करना चाहिए।
श्लोक 41
अहिंसासत्यवचनं ब्रह्मचर्यमधार्मिकम्।
अद्रोहमवधिं चैव यमं सम्पूजयेत्तदा॥
हिंदी अर्थ:
अहिंसा, सत्य बोलना, ब्रह्मचर्य का पालन, अधार्मिकता से दूर रहना, किसी के प्रति द्वेष न करना और संयम – इन यमों की साधना करनी चाहिए।
श्लोक 42
शौचं सन्तोषमास्तिक्यं तपः स्वाध्यायमेव च।
ईश्वरार्पणबुद्धिं च नियमं समुपासते॥
हिंदी अर्थ:
शौच (स्वच्छता), संतोष, आस्तिकता, तप, स्वाध्याय और ईश्वर को समर्पित बुद्धि – ये सभी नियम हैं, जिनका पालन साधक को करना चाहिए।
श्लोक 43
आसनं सर्वदाऽभीष्टं स्थिरं सुखकरं शुभम्।
नातियोगेन नैवाति न चात्यल्पं समाचरेत्॥
हिंदी अर्थ:
हमेशा ऐसा आसन अपनाना चाहिए जो स्थिर, सुखद और शुभ हो। न अधिक कठोरता से करना चाहिए और न ही बहुत ढीले ढाले रूप में।
श्लोक 44
स्वदेशे देशमासीनः सुखासनसमन्वितः।
योगी युञ्जीत योगं च प्राणायामादिसंयुतम्॥
हिंदी अर्थ:
साधक को अपने ही देश (स्थान) में, सुखद आसन में स्थित होकर योग का अभ्यास करना चाहिए जिसमें प्राणायाम आदि भी सम्मिलित हो।
श्लोक 45
प्राणायामं ततः कृत्वा धारयेद्देहमानसः।
प्रत्याहारं च विधिवत्कुर्यादिन्द्रियनिग्रहम्॥
हिंदी अर्थ:
प्राणायाम के अभ्यास के बाद साधक को शरीर और मन को स्थिर करते हुए इन्द्रियों को वश में करने हेतु प्रत्याहार करना चाहिए।
श्लोक 46
दश चन्द्रमसः स्तम्भो लघुः क्षीणान्नसेवनात्।
यावद्बिन्दुं न मुञ्चेत्तु तावत्कालं समाचरेत्॥
हिंदी अर्थ:
चन्द्र नाड़ी (इडा) की गति को दस बार रोकना (प्रत्याहार द्वारा), कम आहार के सेवन से शरीर हल्का होता है। जब तक बिन्दु (वीर्य) का उत्सर्ग न हो, तब तक योगाभ्यास में लगे रहना चाहिए।
श्लोक 47
बिन्दुं रक्षेत्सदा योगी प्राणापानसमन्वितम्।
ब्रह्मचर्येण योगेन सदा सिद्धिं प्रपद्यते॥
हिंदी अर्थ:
योगी को सदा अपने बिन्दु (वीर्य) की रक्षा करनी चाहिए, प्राण और अपान की गति के संतुलन से। ब्रह्मचर्य और योग के अभ्यास से वह सिद्धि को प्राप्त करता है।
श्लोक 48
नारीणां च विशेषेण रजोरूपेण संस्थितम्।
बिन्दुरूपं समासाद्य योगेन परिपालयेत्॥
हिंदी अर्थ:
स्त्रियों में यह शक्ति रज के रूप में स्थित होती है। जब वह बिन्दु रूप में परिणत हो, तो योग द्वारा उसकी रक्षा करनी चाहिए।
श्लोक 49
एवं रक्ष्यं सदा बिन्दुं योगी योगपरायणः।
प्रत्यहं नैव नाशं यायात्समधिगच्छति॥
हिंदी अर्थ:
योगी को सदा अपने बिन्दु की रक्षा करते रहना चाहिए। जो इसे प्रतिदिन सुरक्षित रखता है, वह कभी नष्ट नहीं होता और उच्च अवस्था को प्राप्त करता है।
श्लोक 50
ध्यानं कुर्यात्सदा योगी सत्त्वशुद्धिकरं परम्।
चित्ते स्थिरे समाधिस्तु तदा सिद्धिर्भविष्यति॥
हिंदी अर्थ:
योगी को सदा ध्यान करना चाहिए, जो सत्त्व की शुद्धि देने वाला और परम फलदायक होता है। जब चित्त स्थिर होता है, तभी समाधि और सिद्धि प्राप्त होती है।
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